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________________ ससाद गोवञ्जियहि घणदिणाहं सुखखावहिंधणिग्नदि मलिनचिनर्टिजरघरोहिं कि इसिहिणविसदरहिं जडवायहिणगयरसहिदोसामरदिपरकसहिं आचक्रियपरम्म डीपलहिं वरकेशणदिशश्हयखलहि जोवालहसतोसहक रामाहिरामुल्लापसमउजासु मईकश्वविदियसेन सासुविङजयकिय रेमोठाधनानिमडबुद्दिपरिगडामध्य यसगड उकासुविकरमवय सकिदकरमिकश्मण नलहमिकितपुजयुजेषि सुणययसकलारणातषिसुणेविसरहेतु जुतावासकरवलतिलयविमुक्कगावा प्रिय सिमिमिमिमतकिमिसरियरधु मिवेविकलेव रक्तणिमगंधु बवग्यविवउमसिकसणका नसुंदरपणसिक्रिमकाउ निकारण्दामणुष होमनाससहावलेश्दोसु दयतिमिर णियस्वकरमिटाणु पसुदाइडलूमहानाउलाए जश्ता किसोमंडियसाद पठरुवशि यसियनिरिहाई कामगाणाऽपिसण्यविसहियतेल खवच्छणमेदहोसारमेड जिणचरणक। मलसन्निबाणा तार्जपिटकावपिसबएणना पनहठहोमिविनखणु णापमिलकणाद जहाँ हत दुष्टों के द्वारा श्रेष्ठ कवि की निन्दा की जाती है, जो मानो (दुष्ट) मेघ दिनों की तरह गो (वाणी/ सूर्यकिरणों) से रहित हैं (गो वर्जित), जो मानो इन्द्रधनुषों की तरह निर्गुण (दयादि गुणों/डोरी से रहित) यह सुनकर, तब महामन्त्री भरत ने कहा- "हे गर्वरहित कविकुलतिलक, बिलबिलाते हुए कृमियों से हैं, जो मानो (काले) बादलों तरह मैले चित्तोंवाले हैं । जो मानो विषधरों की तरह छिद्रों का अन्वेषण करनेवाले भरे हुए छिद्रोंवाले सड़ी गन्ध से युक्त शरीर को छोड़कर, विवेकशून्य स्याही की तरह काले शरीरवाला कौआ, हैं, जो मानो जड़वादियों की तरह गतरस हैं, जो मानो राक्षसों की तरह दोषों के आकर हैं, तथा दूसरों की क्या सुन्दर प्रदेश में रमण करता है? अत्यन्त करुणाहीन, भयंकर और क्रोध बाँधनेवाला दुर्जन स्वभाव से पीठ का मांस भक्षण करनेवाले (पीठ पीछे चुगली करनेवाले) हैं, जो (प्रवरसेन द्वारा विरचित सेतुबन्ध काव्य) ही दोष ग्रहण करता है। अन्धकारसमूह को नष्ट करनेवाला और श्रेष्ठ किरणों का निधान, तथा उगता हुआ बालकों और वृद्धों के सन्तोष का कारण है, जो राम से अभिराम और लक्ष्मण से युक्त है, और कइवइ सूर्य यदि उल्लू को अच्छा नहीं लगता तो क्या सरोवरों को मण्डित करनेवाले तथा विकास की शोभा धारण (कपिपति-हनुमान्, कविपति-राजा प्रवरसेन) के द्वारा विहित सेतु (जिसमें सेतु-पुल रचा गया हो) सुना करनेवाले कमलों को भी वह अच्छा नहीं लगता? तेज को सहन नहीं करनेवाले दुष्ट की गिनती कौन करता जाता है ऐसे उस सेतुबन्ध काव्य का क्या दुर्जन शत्रु नहीं होता? (अर्थात् होता ही है)। है? कुत्ता चन्द्रमा पर भौंका करे।" तव जिनवर के चरणकमलों के भक्त काव्यपण्डित (पुष्पदन्त) ने कहापत्ता-न तो मेरे पास बुद्धि का परिग्रह है, न शास्त्रों का संग्रह है, और न ही किसी का बल है, बताओ घत्ता-"मैं पण्डित नहीं हूँ, मैं लक्षणशास्त्र (व्याकरण शास्त्र) नहीं समझता। छन्द और मैं किस प्रकार कविता करूँ? कीर्ति नहीं पा सकता, और यह विश्व सैकड़ों दुष्टजनों से संकुल है" ॥७॥ Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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