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________________ जलसमाधिनाशामसतरामद्यविनासायावतजिनमहासविमटयोपाणिनिमाण। रणारयतिरियघटानविवायालासविदयणाउंधिगयामउविजापाउविरुणुताणामउनु पुतपहेणिवंधण तणुसंघाउतहसंठागतएशंगोटविणामापळे तणुसंघडावमगधिबळ रसणामअवरुविफासिबउ अपविधनगरुगलङलरिकल नवघाउविपरधाठविद्याखिउकेसा सविवादारजायन अपविहायगचितसकायथावस्थूलसुद्धमुपज्ञानड गप्पा यात पत्नयागामुसाहारण थिरुअथिरुविसुहणाउसकारण अपदसलण्डवस्तुसुसरिल्लल उत्सरादेडाजगतलणामुअणादेगाउउसकितिति तिळयहणिमिमलकितिविघला। चमगजम्मण गणामधहहविक इंदियानिजाणामुहपुपचविद्धाशाहपधिपचणा मईपघधिहएकुतिलयउदादोडविहरंदोलखाचविहई उजाममजाकविह समलामलईदासिजगगावताऽमिजहिंहरपरिचन्नई माणसायबसायणिवार बाखिला हदेनसंघाख अंतराळवविद्यधुणपिए अख्यालासनसउविहणप्पिणु पयडिदिमाणवंयमले मिणु सहसहाउसलहपिणु जेगमपरमजावणिबाणही डकविमुक्कहोसासयठाणहोचर २०१ ३२ क्रोध, मान, माया और लोभ को भी शान्त कर दिया। स्त्रीत्व और पुरुषत्व के भाव को उड़ा दिया। भय, रति, अरति, जुगुप्सा को उन्होंने जीत लिया। शोक के साथ हास्य को भी समाप्त कर दिया। सुर, नर, नरक और इस प्रकार पाँच प्रकार के पाँच नामों [अर्थात् (१) औदारिक आदि पाँच शरीरों का संघात, (२) कृष्णतिर्यंच इन चार आयु कर्मों को भी और बयालीस भेदवाले नाम कर्म को भी, गतिनाम और जातिनाम, शरीरनाम नील-पीतादि पाँच वर्ण, (३) कटु-तिक्त आदि पाँच रस, (४) औदारिकादि शरीर-निबन्ध, (५) औदारिकादि और शरीरसंरचना, शरीर संस्थान, शरीर अंगोपांग और निर्माण, शरीर का बन्धन, वर्ण-गन्ध, रस-स्पर्श, पाँच शरीर, औदारिक वैक्रियक और आहारक शरीर के अंगोपांग (एक के त्रिभेद) दो प्रकार दो (सुभग, दुभंग, आनुपूर्वी, अगुरुलघु भी लक्षित किया। उपघात और परघात भी कहा गया। उच्छ्वास, आतप, उद्योत, प्रशस्त, अप्रशस्त), दो छह, (समचतुरस्त्र, वल्मीक, न्यग्रोध, कुब्ज, वामन, हुंड संस्थान और वज्रर्षभनाराच, विहायोगति, त्रसकाय, स्थावर, स्थूल, सूक्ष्म, पर्याप्त और भी अपर्याप्त माना जाता है। प्रत्येक शरीर, साधारण बज्रनाराच, नाराच, असंप्राप्त, अस्पृष्ट आदि संघट्टन), दो-चार (नरकादि गतियाँ और गत्याद्यनुपूर्वियाँ), आठ शरीर, स्थिर-अस्थिर, सकारण शुभ-अशुभ, सुभग, दुर्भग, सुस्वर और दुस्वर । आदेय भी जग में भला होता प्रकार (कर्कश-मृदु गुरु-लघु, शीतोष्ण-स्निग्ध, सूक्ष्म और स्पर्श नाम),की प्रकृतियाँ जो नाम उच्चारण करनेपर है, अनादेय यश:कीर्ति, अयश कीर्ति और तीर्थंकरत्व। एक-एक प्रकार की हैं। संसार में गोत्र भी ऊँच-नीच दो प्रकार का है, जिनको उन्होंने दूर से त्याग दिया है। घत्ता-चार गतियों में जन्म के नाम से गति नामकर्म आठ का आधा चार होता है । इन्द्रियों के लेने दान भोग-उपभोग का निवारण करनेवाला, वीर्य और लाभ के कारणों का संहार करनेवाले पाँच प्रकार के अन्तराय से जाति नामकर्म पाँच प्रकार का है।३१॥ को नष्ट कर, इस प्रकार एक सौ अड़तालीस प्रकृतियों को ध्वस्त कर, प्रकृतियों से मानवशरीर को मुक्त कर, स्वयम्भू शुद्ध स्वभाव प्राप्त कर, जो जीव दु:ख से विरहित शाश्वत स्थान में गये हैं, Jain Education International For Private & Personal use only 213 www.jaineminary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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