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________________ शारिजिवणुसुस्पवरतिसिंचविपंच यासममिचडनिणराकिमविहम्ममाणसमीरा सासयक रणुजयविवरण देखणायाणयहांचयदा होतिजावकिपिकिहा ताईचहजादाश्समासमा सातहलियाहणलावखम जेमातल्बसिदिसिहपरिणामही तमकम्युपायालविणिसामहो जान लामजाजियनहो तिघकसायरसहिंयमतही जिदासहिलावदाववइंधण तिदकमण जिवमहावंधण यसहंधसकसयकसंध सिडुलडारकिपिणबंधश्अलवजीवजिणणादि इक्वियाएकातेविअणंतथिमक्किम मसुश्चहिमणजउकेवल पाणावरण विमुक्कसुणिम्मल गिहाणिहापालापयला श्राणगिहिणिहामुणुपयला चकत्रचकुदसणावरण वहाकेव लक्ष्साह्मण तहिविणासिनणवसंखादा वेवणायसायासायन दसपमाहणानसम्म विमिळवावसम्मामिचविडविडचरितमादिकायत पोकसाउणामयकसाब संका सायजायउसोलहविक श्यरूरणस्मिपळणवविक पढमकसायचठकसलासपु सनम सायगामिदिहिसराधना अश्कोङसमापु मायालेकविडारू दसमबृणजाराज विपवाहतिळयकाअवरुअपवरकाणुगुरुकूल पञ्चरकाणुचठक्कविमुकरर्सजलवि घत्ता-नारकियों के चार गुणस्थान होते हैं और देवों के भी चार होते हैं । तिथंच पाँचवें गुणस्थानों तक केवलज्ञान जो अत्यन्त निष्कल और नाना आवरणों से मुक्त है। निद्रा, अनिद्रा, प्रचला, अप्रचला, स्त्यानगृद्धि, चढ़ सकते हैं। मनुष्य समस्त गुणस्थानों में चढ़ सकता है ।। २९॥ निद्राप्रचला, चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण उन्होंने नष्ट कर ३० दिया। साताबेदनीय और असातावेदनीय के दुर्ग को, दर्शनमोहनीय (सम्यक्त्व प्रकृति, मिथ्यात्व प्रकृति, कर्मों से आहत होकर संसारी जीव, शाश्वत परिणामों में उद्यत होते हुए भी विपरीत आचरणवाला हो। सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति), चारित्र मोहनीय दो प्रकार का विख्यात है (कषाय वेदनीय और नोकषाय वेदनीय) जाता है। इस प्रकार दर्शन, ज्ञान और स्वभाव से युक्त जीव उत्कृष्ट और निकृष्ट दो प्रकार के होते हैं। और उसमें कषाय वेदनीय सोलह प्रकार का है, और दूसरे का, जो नौ प्रकार का है, मैं बाद में वर्णन करूँगा। इससे जो उनकी सम-विषम चेष्टाएँ होती हैं जीव उस प्रकार के भावों को ग्रहण करने में सक्षम होता है। पहला जो कषाय चक्र (अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ) है, वह भाग्य के लिए दूषण और सातवें (तरह-तरह के कर्मपरिणामों को ग्रहण करता है)। जिस प्रकार तेल, आग और उसकी ज्वालाओं के अनुसार नरक का कारण है। परिणमन करता है, उसी प्रकार कर्म पुद्गल भी भावों के अनुरूप परिणमन करते हैं। इस प्रकार तीव्र कषायों घना-अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ भी अत्यन्त दुस्तर होता है । वह उपशम को प्राप्त के रसों से प्रमत्त जीवन को यह जीव धारण करता है, जिस प्रकार ईंधन अग्निभाव को प्राप्त होता है, उसी नहीं होता, भले ही तीर्थकर उसको सम्बोधित करें॥३०॥ प्रकार कर्म से कर्म का बन्धन होता है। अशुभकर्म से अशुभकर्म का और शुभकर्म से शुभकर्म की सन्धि होती है परन्तु सिद्ध भट्टारक कुछ भी बन्धन नहीं करते। जिननाथ के द्वारा अभव्यजीव भी चाहे (सम्बोधित दूसरा अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभकषाय भी भारी होती है। प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और किये) जाते हैं, वे एक नहीं, अनेक देखे जाते हैं। मति-श्रुति-अवधि-मन:पर्यय तथा केवलज्ञानावरण। लोभ भी चार हैं। उन्होंने जलते हुए-से संज्वलन For Private & Personal use only www.jainelibrary.org Jain Education Internations
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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