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________________ मसगरमाणकिणावगवरोदासायअविलीणा णिमालनिरुवमनिम्हंकारा जावदचधागणाण। सराय नागमणसहावेंगपिणनहलोउसयलुबिलघणिण अहमयुहवहेनिविहा अलवजा वजिणदेवेदिहावा तसाचणारइविहणतजेविवि तमुणुपमरति पाउपडति संसारमहश वालपाउखुद्द गठमुरकसुवियह णासावणाताव निगावनियावाणापथ हिम्मोह णिमहणिहदापिकादपिल्लाह पियाणाशिमाह पिचयगिजाय पाण्यपितामणि हम्मणिकम्माणितम्माणिजम्म पारामणिकाम पिताम्हाणडामणिसपिच्चस गिगाणिका सपारसमहालावणीसहपारूवाअवन पतहागधम्मातापतिसापछि प्पति स्त्राणमिति गरबासिजति पादासजति सड़णसुजति णमलपालिपति ण जलपधुपति गिगगनतिश्रणयणजिपनि श्रमणाधिजापति सयरायरमतिासिद्धाणजसो ऊतकहश्वमाऊ किमाणवाकोविसुरवठादेवाविधिना पचंदियमुक्खापरमपरायवि। मलेसिहस्साल तणमुकासविखवणायलाहाबदाइविदजायमच्याखिल कहमिश्रजापति अमणिरिखियाधमुधमुदाविछझियायामासकालेसशियागश्ठागोमाहवतणलखाण वे चरमशरीरी किंचित् न्यून, रोग-शोक से रहित सिद्ध स्वरूप नहीं छोड़ते हुए निर्मल अनुपम निरहंकार जीव शब्द और रूप से हीन, अव्यक्त चिन्मात्र, निश्चिन्त निर्वृत्त, जो भूख से ग्रहण नहीं किये जाते, जो प्यास से द्रव्य से सघन और ज्ञानशरीरी, ऊर्ध्वगमन स्वभाव से जाकर समस्त ऊर्ध्वलोक को लाँघकर आठवीं धरती नहीं छुए जाते, जो रोगों के द्वारा क्षीण नहीं होते और न रति से दु:ख को प्राप्त होते हैं। आहार नहीं लेते, की पीठ (मोक्षपीठ) पर आसीन हो गये, ऐसे अजन्मा जीवों को जिन भगवान् ने देख लिया। औषधि का प्रयोग नहीं करते। मल से लिप्त नहीं होते और न जल से धुलते हैं, नींद को प्राप्त नहीं होते, जो घत्ता-अनन्त वे आदि और अनादि के भेद से दो प्रकार के विविध दु:खवाले संसार के मुख में फिर बिना आँखों के भी देखते हैं, बिना मन के जान लेते हैं, शीघ्र ही सचराचर विश्व को। सिद्धों को जो सुख से नहीं पड़ते, उनकी मृत्यु नहीं होती।। ३२॥ है क्या उसे कोई चर्म चक्षुओंवाला मनुष्य, देव या विद्याधर कह सकता है। घत्ता-पाँच इन्द्रियों से मुक्त विमल परम पदों में सिद्धों को जो सुख होता है वह सुख विश्वतल में किसी को भी नहीं होता ॥३३॥ वहाँ न बालक हैं, न वृद्ध, न मूर्ख हैं और न पण्डित हैं, जो शाप और तप रहित । गर्व और पाप से रहित, ३४ काम और इन्द्रिय बोध से शून्य, देहचेतना और स्नेह से रहित, क्रोध और लोभ से रहित, मान और मोह इस तरह दो प्रकार के जीवों का मैंने कथन किया। अब मैं अजीव का कथन करता हूँ जैसाकि मैंने देखा से रहित, वेद और योग से रहित, नीराग और निर्भोग, निर्धर्म-निष्कर्म, क्षमा और जन्म से रहित, स्त्री और है। धर्म, अधर्म, आकाश और काल के साथ रूप से रहित हैं ऐसा समझना चाहिए। गति, स्थिति, अवगाहन काम से रहित, बाधा और घर से रहित, द्वेष और लेश्या से दूर, गन्ध-स्पर्श से शून्य, नीरस महाभाववाले, और वर्तना लक्षणवाले Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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