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________________ पवियापिठ तजिअरिहामुपयंपिठ अंजिरिडहकिरपठमाउसु तंमधविहेदेसिअचिरा साजरउमद्यविहड्तवियहे तंत्रासासमरणमाद्यवियह विक्रिस्थिासरीविसासंशह। विश्रहादीहाउस्माई होतिग्रहोहोरंदविवरशहाविअहोदामद तिमिरहोत्यिहाहारण इपरकहातिअहोहोतिइंडकचिव ज्ञशेतहलाई पहरण कडिहिणिहालमतणलवल गति सूअलवाश्वसमिलिया। अकमिसुरदहवयंचविवि सोलहड़णवपंचविष्ण रवि पाढेरजगप्पहाधरविहे विवरतखडरसत्रिह असरघरहिवनसहिरामरकज्ञा शामधाईचारासालकरचारिलखाश्वपहलवणकारितासाससाइह दावसमा दथणियतडिणामहयासाणलकामाखरामह एकछाहालकाईछहत्तरिअरकपत्रमा यणमयकेसरिलकणवलसाहियधारहावासाहसमारकमा कोडिटसनडारि लकशपिंडाकारहौतिपश्चरकसावणामपन्नाश्चादहमालहसहसणिराईवासार सविससईचीणावेणपणवनिम्योसईयवरामिपरिमलसिरिहारण वाणगयणयलजलाही सरितारण वितरणयरंचमणीलए होतिगणतहसवाईअाधना जायणसामन्त्रात्रा पणे २१ आयु कही गयी है वह अरिष्टा की जघन्य आयु कही गयी है। जो आयु अरिष्टा की उत्तम है वही मघवा की अचिरायु ( जघन्य) कही गयी है। दु:ख से सन्तप्त मघवा की जो पूरी (उत्कृष्ट) आयु है, वह माधवी नरक भूमि मैं दस, आठ, पाँच, सोलह, दो, नौ और फिर पाँच प्रकार के देवों का वर्णन करता हूँ। प्रचुर रतिरस में आसन्नमरण ( जघन्य आयु) है। इस प्रकार (ऊपर से) नीचे-नीचे विक्रिया शरीर की रचना और दीर्घ की स्थितिवाली इस रत्नप्रभा भूमि के विवर के भीतर (खर और पंक भाग में) अवधिज्ञानियों या सर्वज्ञों के आयुवाले बिल होते जाते हैं। नीचे-नीचे बड़े-बड़े बिल होते हैं, नीचे-नीचे सघन अन्धकार हो जाता है। लिए प्रत्यक्ष असुरवरों के चौसठ लाख एवं नागकुमारों के चौरासी लाख भवन हैं। सुपर्णकुमारों के प्रचुर नीचे-नीचे दुर्दर्शनीय युद्ध होता है। नीचे-नीचे तीव्र दुःख होता है। आभा से व्याप्त बहत्तर लाख, द्वीपकुमारों, उदधिकुमारों, स्तनितकुमारों, विद्युत्कुमारों, दिक्कुमारों और घत्ता-युद्ध करते हुए उनके करोड़ों शस्त्रों से दलित शरीरकण मिले हुए पारद कणों की तरह प्रतीत अग्निकुमारों के नौ लाख साठ हजार भवन हैं। इस प्रकार भवनवासियों के कुल मिलाकर सात करोड़ बहत्तर होते हैं ॥२०॥ लाख प्रत्यक्ष भवन हैं। भवनवासी देवों का इस प्रकार कथन किया गया है। भूतों और राक्षसों, वीणा, वेणु और प्रणव के निर्घोषों से युक्त सोलह और चौदह हजार आवास विशेष होते हैं। दूसरे विशिष्ट तथा विमल लक्ष्मी को धारण करनेवाले देव बन, आकाशतल, समुद्र और सरोवरों के किनारों पर निवास करते हैं। व्यन्तरों के सुन्दर निवास गिनती करने पर संख्यातीत हैं। For Private & Personal use only ___www.jaine205am Jain Education International
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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