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Disclaimer: This translation does not guarantee complete accuracy, please confirm with the original page text.
Here is the English translation, preserving the Jain terms: The Panchpavarnakaya (five-colored body) of the Naraki (hell-beings) is filled with Telpanari (oil-like liquid), Risishushrumana (painful sensations), and Aindiya (sense organs). They are Supanna (without happiness), Patmadahana (burning in flames), Arayagasamadha (pierced by weapons), Patiagitaralamena (surrounded by venomous snakes), and Vadahapahada (beaten by clubs). In the first Naraka (hell), the body of the Naraki is seven Dhanus (bows), three Hasta (hands), and six Angula (fingers) in size. In the second Naraka, it is fifteen Dhanus, six Hasta, and twelve Angula in size. The Naraki's body becomes heavy due to the Vikriya (transformation) during the Ghattaratijana (fierce) war. In the first Naraka, the Ayus (lifespan) is one Sagara (ocean) measure, in the second it is three Sagara, in the third it is seven Sagara, in the fourth it is ten Sagara, in the fifth it is seventeen Sagara, in the sixth it is twenty-two Sagara, and in the seventh it is thirty-three Sagara. The Naraki beings live in despair, crying and screaming without happiness, and they cut each other bit by bit. In the third Naraka, the body is thirty-one Dhanus, one Hasta, and two Angula tall. In the fourth Naraka, the body is sixty-two Dhanus tall, and they live for ten thousand years in that inauspicious Dharmabhumi (land of religion). In the fifth Naraka, the body is one hundred and twenty-five Dhanus tall. The Vanshabhoomi (lineage realm) has the worst Ayus, which destroys the hopes of happiness. In the sixth Naraka, the Jinendra Bhagavan (Jain Omniscient) has stated that the best Ayus is two hundred and fifty Dhanus, which is the worst Ayus of the Megha (cloud-like beings). In the seventh Naraka, the body height is five hundred Dhanus, which is the worst Ayus of the Anjana (collyrium-like beings).
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________________ एचपावालश्यही पंचपवारुडकणारयादी तेलपाणारिणरिससुश्रयमाणमाइण्डिया सेसुपनस पटमदहणारयगासमधपतियागितरालमेनईवादहयपाहदा वारहधपरमपिउधयलवियारह घिनरुवहरदेहाट परतदारणरणरणएंगस्याराहा पारयदडविउद्ययाय रातयःहएकलासूधपुनराशावयतिणुकमडुरिटगज्ञा चावियाहेश्यणायजाधवाश्वासद्धिपउत्तरपवमियधपुसंध्यवासावा हव्वावस्यासास नहियादवावजिपालणिददामिसय पचासजिगणियज्ञा देडछेडाहोहडग्गमियदे पंचसयाईहाप्रसन्नमियदे एकुपहिलेण्डुकिमडझाय जलदिप मायातिपिडपतिजपारण सत्तचोकहदह सायराइपचमसमारह हरायुषवाबासी परहियासमतासनिअहियांकहिदज्ञाधना करतकपत महिघुलत मुहंतरिखाजा वतिदयासापायतिवतिलकपरिहालिजियतिग्रहमण्यमरहोऊडहवरिससहाया सईधम्मद जंघमन्त्रमुतवसह आउजदमदालयसुदयह जवसहेडतिमुर्तसलहे या सुजाण ठरलवरोलहे असलहेनिउणिहिहन अंजणाहतकिरणिविहान अजणहपरम पाँच प्रकार का दुख पापों के समूह से गृहीत नारकीयों को होता है। वहाँ न नारी है, न पुरुष हैं, और न सुन्दर शरीरावयव है, नंगा, निन्दनीय और अशेष नपुंसक। प्रथम भूमि में नारकीय का शरीर सात धनुष तीन हाथ और छह अंगुल का होता है। दूसरी भूमि में पन्द्रह धनुष छह हाथ और बारह अंगुल होता है। घत्ता-अरतिजनक युद्ध में जन्म को धारण करनेवाली देह से प्रहार करते हुए विक्रिया के द्वारा नारकीय का शरीर भारी हो जाता है ॥१८॥ से अजेय पहले नरक में एक सागर प्रमाण आयु होती है, दूसरे में तीन सागर, तीसरे नरक में सात सागर, चौथे नरक में दस सागर, पाँचवें नरक में सत्तरह सागर, छठे नरक में बाईस सागर प्रमाण रहते हैं और सातवें नरक में तैंतीस सागर प्रमाण आय होती है। घत्ता-आक्रन्दन करते, चिल्लाते हुए सुख से रहित नारकीय जीव हताश होकर जीते हैं, और तिलतिल एक दूसरे को काट देते हैं ॥१९॥ १९ तीसरी भूमि में इकतीस धनुष एक हाथ और दो अंगुल ऊँचा शरीर होता है । चौथी भूमि में बासठ धनुष वे नारकीय उस असुन्दर धर्मा धरती में जघन्य आयु से दस हजार वर्ष जीवित रहते हैं। जो धर्माभूमि और दो हाथ ऊँचा। पाँचवीं भूमि में एक सौ पच्चीस धनुष ऊँचा शरीर होता है। इस प्रकार शरीर बढ़ता जाता को उत्तम आयु है वह सुखों के आशयों को नष्ट करनेवाली वंशाभूमि की जघन्य आयु है। जो वंशाभूमि की है और आपत्ति भी भीषण होती जाती है। छठी भूमि में जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कथित दो सौ पचास धनुष उत्तम आयु है वह रौरव ध्वनियों से युक्त मेघा की जघन्य आयु है। जो मेघा की उत्तम आयु बतायी गयी ऊँचाई होती है। द:ख के समह से दर्गम सातवीं भूमि में शरीर को ऊँचाई पाँच सौ धनुष होती है। दुष्कृतों है वह अंजना की निकृष्ट आयु है। जो अंजना की उत्तम Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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