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________________ सरार महिलातरविष्फुरियाणण खतिविचपाईपचाणण वहिणिजलपजालूपजालि यंठे जहिंववस्तार्दिखलयएमिलियन माजहिंजितहिंडम्मिा पिंडईयरुहिरकिमि रिटाईविनितिहिंपचहिपाडिविस्थिहो एण्यदायददाणीसरिसहोमि। उकले विताम् दिनकितिणियासणवायसवलयासमिहितावियनविहसणवायचजदिय जेतहिजेजमसासण वश्सजहिजेतहिंसलासणु सुजनहितहिजेडगंधणारसाफस साशवराहस्यियोगालयकामहो अहलेषजतिपरिणामही पिसाजहिजेतहिजे डवयणफंसजर्हिजतहिंजेवरसयाजधाकश्ततविरसिलजिचितस्ततमपसलूमात्र घायतकणियंगनाणरमखनिणउकाईविर्थग महवायुयश्वासुजलोयरु अलिककिसिर विक्षणमहालक संवंतिडक्विनहलगा सबवाहिठयायदेहपाना अणुमालयाकालस कालवकिपिजहिंसागरिउडक काईकहिनायतहिापाहणाग्यपडिणारायण हठमविश्होतउसहलामा यववर्णउकाचवायज्ञमाणासिण्डसंतपाई दागवणिवह हिंपरियोजनक्षमाणसाएवलाणिजश्डं पणविरलवसरदारिल बरमझिमहिलाकारणे पहाड़ों की गुफाओं में से तमतमाते हुए मुखवाले विक्रिया से निर्मित सिंह खा जाते हैं। जहाँ के मार्ग अति खाँसना, जलोदर, आँखों, पेट और सिर का दर्द तथा महाज्वर ये सब होते हैं। पापों के फलों के घर अग्निज्वालाओं से प्रज्वलित हैं, वह जहाँ जाता है, उसे दुष्ट मिलता है। जहाँ वह स्नान करता है वहीं पीब, नारकीय को देह में सब-कुछ व्याधि है। रुधिर और कीड़ों से भरे हुए कुण्ड और पीड़ित शरीर मिलते हैं। दो-तीन-पाँच व्यक्तियों द्वारा पीड़ित कर घत्ता-पलक मारने के समय तक का भी सुख जहाँ नहीं मिलता, हे राजन्, वहाँ शरीर के दुःख का वह पकड़ लिया जाता है और पीब के सरोवर से नहाकर (उसे) क्या वर्णन किया जाए? ॥१५॥ __घत्ता-काटकर चमड़े का परिधान दिया जाता है। तपाये हुए लोहे के कड़े उसके आभूषण होते हैं ॥१४॥ १५ 'मैं नारायण हूँ, मैं प्रतिनारायण हूँ, मैं सुखभाजन राजा हूँ ' ऐसा कहते हुए उस पर यम क्रुद्ध हो जाता वह जहाँ देखता है वहीं यम-शासन है । जहाँ बैठता है वहीं पर शूलासन है। जहाँ भोजन करता है वहीं है; और वह मानसिक दुःख से सन्तप्त हो उठता है। दानव समूह के द्वारा वह प्रेरित किया जाता है और युद्ध दुर्गन्ध है। नीरस कठोर और विरुद्ध । जो चखता है वह विरस लगता है, जो सोचता है वही मन की चिन्ता करते हुए; उससे उस प्रकार कहा जाता है, 'तुम्हारा इसके द्वारा सिर फाड़ा गया था; श्रेष्ठ महिला और धरती बन जाता है । जो सूंघता है वह बुरी गन्धवाला होता है, नारकीय क्षेत्र में कुछ अच्छा नहीं होता। ऊर्ध्व श्वास, के लिए मारे गये थे। For Private & Personal use only www.jainelibrary.org Jain Education Internation
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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