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________________ रहतास रणवश्वयविसंलरमिश तिरियलाउमशहमुदायिठ माटावरगिरिखस्यविहसिट जामणादणरखेचरखापन यणयालासलरकविछिनिवृहाउसबदावेसस एकुलकुजायण ब्दपविरूदासाचाहिययाई जायसवा विहियाणरणयाईदादिपॉडतछविचार अभावधरपतेपायवार उत्तरदादिणाहवयहद पसायलिपिङलतुयपहही पंचवासनछेडा समासिउ यसहसहिमवंतदोलासिठ सवावाडविकासाहित सब गसिहरिययासिना पंचतरसपासङलकिया दामिसहसहमवयहाअखिया अवरुहिरमवतमापाठ साहिल दोदिमिराकपमाणले होइमहाहिमवहारुदत्रणु चनसहासत्राहियमानहाय दोषिदहात्रय इधुढासळ रुम्मिडविकविनसिलदिहलाघा खशहागुरुखन गिरिगराउगिरिवरहोसा मारण तिकरज वयाणचुवाजिणवरदो चिसयादितिसहासईएकचासजायाश्ययास इंअहियाहाँतिकिपिहरिवरिसही तजिमाएसम्पयन्हासहरिसदा अहसासोलहसहसालज ताजिजापहिवाश्नालई सादियाणिमहहापिङमाण सामरसयसमिछगत्तषु णील होतंजिणवाणिवार विहिमिविदेदहरुदिमई परमसरुत्तेतीससासईमुईसयाईचठरासायण उनके पन्द्रह, तीस, नब्बे और छह भेदों को याद करता हूँ॥२॥ कहा गया है। महाहिमवत् कुलाचल का विस्तार चार हजार दो सौ दस, दस बटा उन्नीस ४२१०४.) योजन। (उसकी ऊँचाई दो सौ योजन) कहा गया है। रुक्मि कुलाचल का भी मान इसी प्रकार देखा गया है। लोक के मध्य में तिर्यक (तिरछा) रूप में फैला हुआ और मनुष्योत्तर गिरिवलय से विभूषित पैंतालीस घत्ता-क्षेत्र से चौगुना क्षेत्र और पर्वत से चौगुना पर्वत है, इसमें भ्रान्ति मत करो। जिनवर का वचन लाख योजन विस्तारवाला मनुष्य क्षेत्र है। एक लाख योजन विस्तार का जम्बूद्वीप सबसे श्रेष्ठ है। कुछ अधिक कभी चूक नहीं सकता। ( गलत नहीं हो सकता) ॥३॥ पाँच सौ छब्बीस योजन (५२६१. योजन) वाले जिसमें मनुष्यों के नगर और नगरियाँ निर्मित हैं। दक्षिण भरत का विस्तार पाँच सौ छब्बीस योजन है, उत्तर में इतना ही विस्तार ऐरावत क्षेत्र का है। भरतक्षेत्र में उत्तर से हरिक्षेत्र कुछ अधिक आठ हजार चार सौ इक्कीस, एक बटे उन्नीस योजन प्रकट किया गया है। रम्यक लेकर दक्षिण तक, गुणों से भरपूर पचास योजन चौड़ाईवाला विजयाध पर्वत है। उसकी ऊँचाई पच्चीस योजन क्षेत्र का विस्तार भी इतना ही है। निषध पर्वत का विस्तार सोलह हजार आठ सौ बयालीस दो बटे उन्नीस योजन कही गयी है। हिमवन्त कुलाचल एक हजार बावन (१०००) योजन विस्तारवाला है, ऊँचाई में सौ योजन है। उसकी ऊँचाई चार सौ योजन कही गयी है। नील कुलाचन का भी विस्तार और ऊँचाई इतनी ही है, उसका है, शिखरी पर्वत भी इतना है। दूसरा हैमवत क्षेत्र दो हजार एक सौ पाँच, पाँच बटा उन्नीस (२१०५४) कोई निवारण नहीं कर सकता। दोनों (अर्थात् निषध और नील कुलाचल) मिलकर विदेह क्षेत्र के विस्तार योजनवाला कहा जाता है और दूसरा हैरण्य (हिरण्यवत्) क्षेत्र इसी मानवाला है, दोनों को एक प्रमाणवाला की रचना करते हैं, जो तैतीस हजार छह सौ चौरासी, चार बटा उन्नीस (३३६८४१,.) योजन है। Jain Education International For Private & Personal use only www.jain193.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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