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________________ २= जीयन समईस कम्म चिया पकुजे अजबंधु डुगाउछु डुवुडिडरास कुलकुमाण सन्ति इणिहालउ यक्कु जेा वडुवडालना कुजेधहरु सवरुणं तर एक जिसुरवर मणिमयसुर हरे पापडिया सम्म हविवलोयणिजिइ एक्हुजे नहेन हयस्थले थलाक यकुजेविले विसहरुजलेज लयल एक जेमिगजोलिदिउ परेहिंनलिनले दिखाइए * बुजेडूहले समाई णस्यविवरिणाय हिंहम्मई एक जेत्तरश्मर व इतर पिदे चरअलग पड लियरधित्र जेल व कमेविड रद कर कण्ठ यजेतवता वि लाविना होइली उपरमव ॥ ३॥ जेडवं ॥ इमणि सुगविणं गार्डनियम नियमणं जीउवरायम् समलुविडजेलो अपदि प्रमाणु अहिनिवशरणपिंडाज्ञिसंवश पुजी अणु जेडक्कियमल सुविपुजतो फल पर्दिकलिकलत्रुरिजिइ अजेनु चुको दिउण श्रणुजे मित्रुसको क्यायरु अपुने होइ मोहून लायक अजेलिनु होइधपण लादें जानुतविमोदिज्ञश्मा श्रपुजे रण महारउमत्र पाठाई जड्सयल चित्र पहिंर्जतिख एस्ट्वर दयवर रायवरचिंधस चामर परमर्केश को विजोग का पक्केलर जेजाइ दर्शविच ॥घता ।। परिभ्रमण करता है अपने कर्म से विनीत होकर एक जीव जड़ जन्मान्ध, नपुंसक, दुर्गत, दुष्ट, दुर्बुद्धि और दुराशय, कुमनुष्यत्व में होकर दुर्दर्शनीय होता है, एक जीव चण्ड और चाण्डाल होता है। एक बन के भीतर धनुर्धर भील होता है, एक मणिमय विमान में देव होता है, अपने को पुण्यहीन मानता है और इन्द्र के वैभव को देखकर क्षीण होता है। एक जीव आकाश में नभचर और दूसरा स्थल में स्थलचर एक बिल में साँप और जल में जलचर एक पशुयोनि में जन्म लेता है, और दूसरों के द्वारा खण्डित होकर तथा तलकर एक क्षण में खा लिया जाता है। एक दुर्भग, दुःसह और दुर्गति, नरकविवर में नारकियों के द्वारा मारा जाता है। अकेला ही तरता है, अकेला ही वैतरणी पार करता है और ज्वलित प्रज्वलित धरती पर विचरण करता है। घत्ता - जीव अकेला ही रतिसुख का भ्रमर बनकर दुर्दम, विश्वकीचड़ में पड़ता है। जो अकेला ही तप से संतप्त और ज्ञान से भाषित होकर परमात्मा बनता है ॥ ३ ॥ 專 Jain Education International पप् ४ इस प्रकार एकत्व भावना को सुनकर अपने मन को प्रगाढ़ रूप से नियमित करना चाहिए। बेचारा जीव अकेला है और समस्त लोक से भिन्न है। भिन्न परमाणुओं के द्वारा बाँधा जाता है और गर्भ में जो पिण्ड बँधता है वह भिन्न है। जीव भिन्न है और पापकर्ममल भिन्न है, पुण्य अलग है और उसका फल अलग हैं। अन्य के द्वारा कुल में स्त्री ले जायी जाती है। कोई दूसरा पुत्ररूप में उत्पन्न होता है। अपने कार्य में कृतादर मित्र दूसरा होता है, और स्नेही भाई दूसरा होता है। धन-लोभ से अन्य भृत्य होता है, (यह) जीव मोह के द्वारा मुग्ध होता है मतवाला वह अन्य को कहता है कि यह हमारा है नहीं जानता कि किस प्रकार वह सबके द्वारा छोड़ दिया जाता है। आधे पल में रथवर, हयवर, गजवर और चामर सहित पताकाएँ दूसरी हो जाती हैं। परमार्थ में जग में कोई भी किसी का नहीं है। पृथ्वी का ईश (राजा) भी अकेला होता है। For Private & Personal Use Only www.jain1.09.
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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