________________
उगणिया सखासणिया सामापंसा बदधिविकासालासपियरजिमघायणमपंद्र एमाबंदह
वरमुळणठा नालजयाबाद
कुणवमा
मृतकरिश्रादिन नाथागत
थवागश्मीषा करण।
सवितागज दिकिवामि
सामुतावा॥ गटारडताह I सजायताण दिमरस लंजसण्वज्ञ विमलजसात पुकामुणसा
पार्वतीजणहि
जहाँ उनचास तानें कही जाती हैं, वहाँ मैं गीतारम्भ का क्या वर्णन करूँ? उनके संयोगों से विभिन्न रसों की दस में चार का गुणा करने पर चालीस भाषारागों की संख्या जाननी चाहिए। विभाषाराग छह कहे गये उत्पत्ति होती है। इस प्रकार विमल यशवाली नीलांजना नृत्य प्रारम्भ करती है। बताओ, वह किसकी दृष्टि हैं। विद्वानों के मन का रंजन करनेवाली, ग्यारह और दस, इस प्रकार कुल इक्कीस मूर्च्छनाएँ कही गयी हैं। को आकर्षित नहीं करती? नाचती हुई वह लोगों के हृदय का अपहरण कर लेती है।
Jain Education International
For Private & Personal use only
www.jainelibrary.org