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________________ णुकसतालजयालाघ्य समझदार्वजढिवाश्या अमरहिजिगामणसम्माध्यापारहठाउमा दाश्मर्हि उपासपठंडरमाणतरण बावीसविसरमणहतरण कमरश्यपमापहिसाळवश्ववाठ बहिहाधवसत्यविसरिंगमधामणाम सरिसन्नतरदायाचजनामाछवासुरपुन्जयसायाँकन रह जायसवयनमण्यारहयधरहमचिमण्याणियजणवथसुनगमलयादलासा सन्न यारह महारहंजाशभिवहद लखविसहई। सदसञ्चालासदिय एक्कतस्तपिपसा हिमन तदिहातठसवणखणिधर्म गामनपचनपणिय सुद्धासियाचपचसरिया गडासा दाराणिनाक्षणिला तहिंगामरामश्रवस्तपिया ससवनभयरक्षितगणिया श्यतासकमपजि संग हिया नड्माणजिमाणवसवपतिमा पहिलाम्मरकराठकहिन अणुवकासमलासहिंसहि उहादपंचमविषयासिम विर्दियविदासर्दिछसिबल अाधादिममाटियागविलठ हिंदी लमचठलासानिलम मालयवसिठचहिवधिम अवरहिमिदादिमित्रविमल सुहठसविस नदिकलिवड़ कछहिमितिहिलासहिंसवलिमाता सुविहासदिसासर्टिविहिंसदिय सोगा उसुणालाउ मणहरिमनकिरिसमाविसमजाहिंपरिणयपरिमाणठी जामख्यविलासिवादहचर घन बाद्यों (कास्यतालादि) के द्वारा अनेक तालों का एक साथ वादन हुआ। जिन भगवान् का मन में सम्मान भेद होते हैं, उनका भी प्रदर्शन किया गया। उनमें कानों को सुखद लगनेवाली पाँच प्रकार की गीतियाँ होती करनेवाले महादरणीय देवों ने गीत प्रारम्भ किया। नाभिस्थान में उत्पन्न हुई वायु उर:स्थान में क्रमश: नाद हैं, जो शुद्धा, भिन्ना, वेसरा, गौड़ी और साधारणा के रूप में जानी जाती हैं, इनमें और भी ग्राम राग कहे बनकर, कर्णस्थान में बाईस श्रुतियाँ बनाती हैं, और क्रम से रचित प्रमाणों के द्वारा (अर्थात् क्रम से सात स्वरों गये हैं। सात, पाँच, आठ, तीन और सात की संख्या से गिने जाते हैं इस प्रकार क्रमश: तीस भेदों का संग्रह का उच्चारण करने पर) बढ़ता हुआ नाद वृद्धि को प्राप्त होता है। इन बाईस श्रुतियों में सा रे ग म प ध नि किया। ये छह राग मानवों के कानों को सुख देनेवाले हैं, इनमें पहला राग टक्क राग कहा गया है, जो बारह नामक सात स्वर और दोनों ग्राम कहे (इनमें षड्ज ग्राम और मध्यम ग्राम हैं)। भाषारागों से सहित है। आठ भाषारागों और दो विभाषारागों सहित पंचम राग का प्रदर्शन किया गया। समस्त घत्ता-देवों के द्वारा पूजित षड्ज में किन्नरों के द्वारा सात जातियाँ कही गयी हैं। और मध्यम ग्राम विश्व की स्त्रियों को बाधित और मोहित करनेवाला हिन्दोलराग चार भाषारागों का घर है। मालव-कैशिक में लोगों के कानों को सुख देनेवाली ग्यारह जातियाँ कही गयी हैं। (इस प्रकार कुल अठारह जातियाँ होती राग छह जातियों में कहा जाता है और वह दो भाषारागों में अंकित है। शुद्ध षड्ज सात जातियों में रचा हैं।) ॥६॥ जाता है। घत्ता-इस प्रकार सरस सुविभास रागों के द्वारा विधिपूर्वक कानों को लीन करनेवाला वह (गान) गाया सात और ग्यारह, इस प्रकार अट्ठारह जातियों में निबद्ध और लक्ष्य विशुद्ध अंगों के एक सौ चालीस गया कि जिसमें सीमित परिमाणवाली सुन्दर क्रियाएँ दिखाई गयीं ॥७॥ Jain Education international For Private & Personal use only www.ja103y.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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