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________________ लियरतलिग्गयमोतियख कसरी सिसुससिक्कडिलमडल विज्ञानदादा डालता सरोप विरिविष्फुरिया णु जासुलपणावसेवका वजह चड्नुपर मसल सुरवर कुरिकर थिरदा हर करू सोसिरक विसभिनणा सइ कालरकरगणिग अई पाडयाई वड लावर पारणारा लकण पसॐॐ तुम्सायरणाइविचित्र व महचरियइंडिय वह विशई गंधपति जस्यापरिरकल मंतर्तत वरनगयसिरक को तगजासिधाय संतााई बचावपहरणविष्पाणई देसदेसिलासालि विद्या कडूचा यालंकारविहाणाई जो इस लंदन कवा यरणई मझगाहजशक्य करणई वेाणिघंटो सहिविचारुवि बुझिउसयल लोयवावारुवि चित्रले सिलवरतर कम्मई पवमाईअव राई मरम्मई। पयसाय सुरु तिङयणगुरु जासुस जेवषाई अविमल सोसयल कलडकिन परियार बता सुपर वणिजमुस्सोनिवरि सिपाह वसेणलासपगि रिथणिधरणि तरुणिपरिपालन विहिविसयपणास कापलाई पडलोयढमारेसर अ सणिसुणिहिंस रहेसर ववसायसुस हापसंपय होइणिक उपयपाडिया चलस। ६ हाथियों के सिरों से दलित तथा रक्त से लिप्त निकले हुए मोतियों से जिसकी अयाल विजड़ित है, जो बालचन्द्र के समान कुटिल और चंचल बिजली के समान उज्ज्वल अपनी दोनों दाढ़ों से भास्वर है, ऐसा तमतमाते मुखवाला सिंह भी जिसके भय से जंगल का सेवन करता है। ऐरावत की सूँड के समान जिसके बाहु दीर्घ और स्थिर हैं ऐसा परमेश्वर भरत नवयौवन को प्राप्त होने लगा। उसके पिता ने उसे सब सिखाया। काले ( स्याही से लिखित) अक्षर गवित गन्धर्व विद्या, विविध भाव और रस से परिपूर्ण नाटक, नर-नारियों के प्रशस्त लक्षण, उनकी भूषाओं के निर्माण, स्त्रियों के हृदय को चुरानेवाले कामशास्त्र के चरित, गन्ध की प्रयुक्तियाँ, रत्नपरीक्षा, मन्त्र-तन्त्र, श्रेष्ठ अश्व और गज की शिक्षाएँ, कोंत, गदा और तलवारों के आघातों की परम्परा, चक्र-धनुष-प्रहरणों के विज्ञान, देश-देशी भाषा लिपि स्थान, कवि वागलंकार- विधान, ज्योतिष- छन्द- तर्क और व्याकरण, आवर्तन निवर्तन आदि करणों (पेचों) से युक्त मल्लग्राह युद्ध, वैद्यक Jain Education International निघंटु, औषधियों का विस्तार और सर्वलोक व्यवहार भी उसने समझ लिये। चित्रलेप, मूर्ति और काष्ठकला आदि दूसरे दूसरे सुन्दर कर्म सीख लिये। घत्ता - जिसके चरणों में देव नत हैं ऐसे त्रिभुवनगुरु (ऋषभ जिन) जिसे स्वयं शिक्षा देते हैं अत्यन्त विमल उन समस्त कलाओं को वह भरत क्यों नहीं जानेगा ॥ ६ ॥ ७ फिर वह राजर्षि ऋषभ स्नेह के वशीभूत होकर अपने पुत्र से कहते हैं और उसे गिरि हैं स्तन जिसके, ऐसी धरतीरूपी तरुणी के पालन करने की विधि और विषय बताते हैं। प्रभु कहते हैं- "हे प्रथम नरेश्वर भरतेश्वर, तुम अर्थशास्त्र सुनो! व्यवसाय और सहायक होने से सम्पत्ति होती है। प्रजा चरणों में नत रहती है। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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