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________________ ६८ महापुराणे उत्तरपुराणम् मार्गशीर्षे सिते पक्षे जैत्रयोगे तमुत्तमम् । प्रासूत प्रतिपद्याशु तदैत्येन्द्राः सहामरैः ॥ २७ ॥ क्षीराभिषेकं भूषान्ते पुष्पदन्ताख्यमब्रुवन् । कुन्दपुष्पप्रभाभासि देहदीप्त्या विराजितम् ॥ २८ ॥ सागरोपमकोटीनां नवत्यामन्तरे गते । एष चन्द्रप्रभस्याभूत्तदभ्यन्तरजीवितः ॥ २९ ॥ पूर्वलक्षद्वयात्मायुः शतचापसमुच्छूितिः । लक्षाईपूर्वकालेऽस्य कौमारमगमत् सुखम् ॥ ३० ॥ अथाप्य पूज्य साम्राज्यमच्युतेन्द्रादिभिविभुः। अन्वभूत्सुखमाश्लिष्टमिष्टः शिष्टैरभिष्टुतः ॥ ३१ ॥ कान्ताभिः करणैः सर्वैरमुष्मादपि यत्सुखम् । ताभ्योऽनेन तयोः कस्य बहुत्वं कथ्यतां बुधैः ॥ ३२॥ पुण्यवानस्त्वयं किन्तु मन्ये ता बहुपुण्यकाः । याः समभ्यर्णनिर्वाणसुखमेनमरीरमन् ॥ ३३॥ यः स्वर्गसारसौख्याब्धिमानः सन् भुवमागतः । तान्येव भोग्यवस्तूनि यानि त चाभ्यलाषयन् ॥ ३४ ॥ अनन्तशोऽहमिन्द्रत्वं प्राप्य तेनाप्यतृप्तवान् । सुखेनानेन चेदेष तृप्तः सौख्येष्विदं सुखम् ॥ ३५॥ अष्टाविंशतिपूर्वाङ्गयुतलक्षार्द्धपूर्वके । राज्यकाले गते प्रीत्या कुर्वतो दिग्विलोकनम् ॥ ३६ ॥ आपतन्तीं विलोक्योल्कामस्यासीदीडशी मतिः। दीपिकेऽयं ममानादिमहामोहतमोऽपहा ॥३७॥ इति तद्धतुसम्भूतविमलावगमात्मकः । स्वयंबुद्धो विबुद्धः सन् तत्त्वमेवं विभावयन् ॥ ३८ ॥ स्पष्टमय मया दृष्टं विश्वमेतद्विडम्बनम् । कर्मेन्द्रजालिकेनैवं विपर्यस्य प्रदर्शितम् ॥ ३९ ॥ स्वप्न देखकर उसने अपने पतिसे उनका फल जाना और जानकर बहुत ही हर्षित हुई ।। २५-२६ ।। मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदाके दिन जैत्रयोगमें उस महादेवीने वह उत्तम पुत्र उत्पन्न किया। उसी समय इन्द्रोंने देवोंके साथ आकर उनका क्षीरसागरके जलसे अभिषेक किया, आभूषण पहिनाये और कुन्दके फलके समान कान्तिसे सुशोभित शरीरकी दीप्तिसे विराजित उन भगवानका पुष्पदन्त नाम रक्खा ॥ २७-२८॥ श्री चन्द्रप्रभ भगवानके बाद जब नब्बै करोड़ सागरका अन्तर बीत चुका था तब श्री पुष्पदन्त भगवान् हुए थे। उनकी आयु भी इसी अन्तरमें शामिल थी ॥२६॥ दो लाख पूर्वकी उनकी आयु थी, सौ धनुष ऊँचा शरीर था और पचास लाख पूर्व तक उन्होंने कुमार-अवस्थाके सुख प्राप्त किये थे ॥३०॥ अथानन्तर अच्युतेन्द्रादि देव जिसे पूज्य समझते हैं ऐसा साम्राज्य पाकर उन पुष्पदन्त भगवान्ने इष्ट पदार्थोंके संयोगसे युक्त सुखका अनुभव किया। उस समय बड़े-बड़े पूज्य पुरुष उनकी स्तुति किया करते थे ।। ३१ ।। सब स्त्रियोंसे, इन्द्रियोंसे और इस राज्यसे जो भगवान् सुविधिनाथको सुख मिलता था और भगवान् सुविधिनाथसे उन स्त्रियोंको जो सुख मिलता था उन दोनोंमें विद्वान लोग किसको बड़ा अथवा बहुत कहें ? ।। ३२ ।। भगवान् पुण्यवान् रहें किन्तु मैं उन स्त्रियोंको भी बहत पुण्यात्मा समझता हूँ क्योंकि मोक्षका सुख जिनके समीप है ऐसे भगवान्को भी वे प्रसन्न करती थीं-क्रीड़ा कराती थीं ।। ३३ ।। वे भगवान् स्वर्गके श्रेष्ठ सुख-रूपी समुद्र में मग्न रहकर पृथिवी पर आये थे अर्थात् स्वर्गके सुखोंसे उन्हें संतोष नहीं हुआ था इसलिए पृथिवी पर आये थे। इससे कहना पड़ता है कि यथार्थ भोग्य वस्तुएँ वही थीं जो कि भगवान्को अभिलाषा उत्पन्न कराती थींअच्छी लगती थीं ॥ ३४ ॥ जो भगवान् अनन्त वार अहमिन्द्र पद पाकर भी उससे संतुष्ट नहीं हुए ने यदि मनुष्य-लोकके इस सुखसे संतुष्ट हुए तो कहना चाहिए कि सब सुखोंमें यही सुख प्रधान था ॥ ३५ ॥ इस प्रकार प्रेम-पूर्वक राज्य करते हुए जब उनके राज्य-कालके पचास हजार पूर्व और अट्ठाईस पूर्वाग बीत गये तब वे एक दिन दिशाओंका अवलोकन कर रहे थे। उसी समय उल्कापात देखकर उनके मनमें इस प्रकार विचार उत्पन्न हुआ कि यह उल्का नहीं है किन्तु मेरे अनादिकालीन महामोह रूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाली दीपिका है॥३६-३७ । इस प्रकार उस उल्काके निमित्तसे उन्हें निर्मल आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया। वे स्वयंबुद्ध भगवान् इस निमित्तसे प्रतिबद्ध होकर तत्त्वका इस प्रकार विचार करने लगे कि आज मैंने स्पष्ट देख लिया कि यह संसार विड १-पोष्टुतः (१) ल। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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