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________________ पञ्चपञ्चाशत्तमं पर्व इति स्वपुण्यमाहात्म्यसम्पादितमहोत्सवः । स कदाचिन्महैश्वर्यं श्रुत्वा स्ववनपालकात् ॥ १२ ॥ जिनं मनोहरोद्याने स्थितं भूतहिताह्वयम् । गत्वा विभूत्या भूतेशं त्रिः परीत्य कृतार्चनः ॥ १३॥ वन्दित्वा स्वोचितस्थाने स्थित्वा मुकुलिताञ्जलिः । आकर्ण्य धर्ममुत्पन्नबोधिरेवमचिन्तयत् ॥ १४ ॥ आत्मायमात्मनात्मायमात्मन्याविष्कृतासुखम् । विधायानादिकालीन मिथ्यात्वोदयदूषितः ॥ १५ ॥ उन्मादीव मदीवान्धो वावेशी वाविचारकः । यद्यदात्माहितं मोहात्तत्तदेवाचरँश्चिरम् ॥ १६ ॥ भ्रमित्वा भवकान्तारे प्रभ्रष्टो निर्वृतेः पथः । इत्यतोऽनुभवाद्भीत्वा मुक्तिमार्गप्रपित्सया ॥ १७ ॥ सूनवे धनदाख्याय वितीर्यैश्वर्यमात्मनः । प्रावाजीद् बहुभिः सार्द्धं राजभिर्भवभीरुभिः ॥ १८ ॥ क्रमादेकादशाङ्गाधिपारगो भावनापरः । बद्ध्वा तीर्थकरं नाम प्रान्ते स्वाराधनाविधिः ॥ १९ ॥ विंशत्यत्यब्ध्युपमाचायुः सार्द्धहस्तत्रयोच्छ्रितः । शुक्ललेश्यः श्वसन् मासैर्दशभिर्दशभिर्बली ॥ २० ॥ स्मरन् सहस्रविंशत्या वत्सराणां तनुस्थितिम् । १ मानसोद्य: प्रवीचारः प्रासधूमप्रभावधिः ॥ २१ ॥ विक्रियाबलतेजोभिः स्वावधिक्षेत्रसम्मितः । उत्कृष्टाष्टगुणैश्वर्यः प्राणतेन्द्रोऽजनिष्ट सः ॥ २२ ॥ दीर्घं तत्र सुखं भुक्त्वा तस्मिन्त्रागमिष्यति । द्वीपेऽस्मिन् भारते क्षेत्रे काकन्दीनगराधिपः ॥ २३॥ इक्ष्वाकुः काश्यपो वंशगोत्राभ्यां क्षत्रियाप्रिमः । सुग्रीवोऽस्य महादेवी जयरामेति रम्यभाः ॥ २४ ॥ सा देवैर्वसुधारादिपूजां प्राप्य पराधिकाम् । फाल्गुने मूलनक्षत्रे तामसे नवमीदिने ॥ २५ ॥ प्रभाते-बोडश स्वमान् दरनिद्राविलेक्षणा । विलोक्य तत्फलान्यात्मपतेर्ज्ञात्वा प्रमोदिनी ।। २६ ॥ जानता ही नहीं था ॥। ११ ।। इस प्रकार अपने पुण्य के माहात्म्यसे जिसके महोत्सव निरन्तर बढ़ते रहते हैं ऐसे राजा महापद्मने किसी दिन अपने वनपालसे सुना कि मनोहर नामक उद्यानमें महान् ऐश्वर्यके धारक भूतहित नामके जिनराज स्थित हैं । वह उनकी वन्दनाके लिए बड़े वैभवसे गया और समस्त जीवोंके स्वामी जिनराजकी तीन प्रदक्षिणाएँ देकर उसने पूजा की, वन्दना की तथा हाथ जोड़कर अपने योग्य स्थानपर बैठकर उनसे धर्मोपदेश सुना । उपदेश सुननेसे उसे आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया और वह इस प्रकार विचार करने लगा ॥ १२-१४ ॥ अनादि कालीन मिथ्यात्वके उदयसे दूषित हुआ यह आत्मा, अपने ही आत्मामें अपने ही आत्माके द्वारा दुःख उत्पन्न कर पागलकी तरह अथवा मतवालेकी तरह अन्धा हो रहा है तथा किसी भूताविष्टके समान अविचारी हो रहा है । जो जो कार्य आत्माके लिए हितकारी हैं मोहोदयसे यह प्राणी चिरकालसे उन्हींका आचरण करता चला आ रहा है । संसाररूपी अटवीमें भटक भटक कर यह मोक्षके मार्गसे भ्रष्ट हो गया है । इस प्रकार चिन्तवन कर वह संसारसे भयभीत हो गया तथा मोक्ष-मार्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे धनद नामक पुत्रके लिए अपना ऐश्वर्य प्रदान कर संसारसे डरनेवाले अनेक राजाओंके साथ दीक्षित हो गया ।। १५- १८ || क्रम क्रमसे वह ग्यारह अंगरूपी समुद्रका पारगामी हो गया, सोलह कारण भावनाओंके चिन्तवनमें तत्पर रहने लगा और तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध कर अन्तमें उसने समाधिमरण धारण किया ।। १६ ।। समाधिमरणके प्रभावसे वह प्राणत स्वर्गका इन्द्र हुआ । वहाँ बीस सागरकी उसकी आयु थी, साढ़ेतीन हाथ ऊँचा शरीर था, शुक्ललेश्या थी, दश दश माह में श्वास लेता था, बीस हजार वर्ष बाद आहार लेता था, मानसिक प्रवीचार करता था, धूम्रप्रभा पृथिवी तक उसका अवधिज्ञान था, विक्रिया बल और तेजकी सीमा भी उसके अवधिज्ञानकी सीमाके बराबर थी तथा अणिमा महिमा आदि आठ उत्कृष्ट गुणोंसे उसका ऐश्वर्य बढ़ा हुआ था ।। २०-२२ । वहाँका दीर्घ सुख भोगकर जब वह यहाँ आनेके लिए उद्यत हुआ तब इस जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रकी काकन्दी नगरीमें इक्ष्वाकुवंशी काश्यपगोत्री सुग्रीव नामका क्षत्रिय राजा राज्य करता था । सुन्दर कान्तिको धारण करनेवाली जयरामा उसकी पट्टरानी थी ।। २३-२४ ।। उस रानीने देवोंके द्वारा अतिशय श्रेष्ठ रत्नवृष्टि आदि सम्मानको पाकर फाल्गुनकृष्ण नवमीके दिन प्रभात कालके समय मूलनक्षत्र में जब कि उसके नेत्र कुछ-कुछ बाकी बची हुई निद्रासे मलिन हो रहे थे, सोलह स्वप्न देखे । १ मानसोऽर्घ्यं प्रवीचारः ल० । Jain Education International ६७ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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