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________________ ५८ महापुराणे उत्तरपुराणम ग्रुतिस्तस्य द्युतिर्वाभात् मिश्रिता रविचन्द्रयोः । तत्सदा व्यकसन्मन्ये पभानि कुमुदान्यपि ॥ १८६॥ कुन्दहासा गुणास्तस्य चन्द्रस्येवांशवोऽमलाः । विकासयन्ति भव्यानां मनःकुवलयावलिम् ॥ १८७ ॥ सहोत्पत्तौ श्रियोऽनेन सोदर्येन्दोरिति अतिः । अजामद्भिर्जनैरेतदन्यथा परिकल्पितम् ॥ १८८॥ चन्द्रस्येवोदयेऽस्यापि सर्वसन्तापहारिणः । हादते भासते व ते स्म लोको निराकुलः ॥ १८९॥ एतस्यैव गुणलक्ष्मी २मन्ये कीर्तिश्च निर्मला । कारणानुगुणं कार्यमिति सत्यं भवेद्यदि ॥ १९ ॥ महाविभूतिसम्पनः उसज्जमजनमङ्गलः । सालङ्कारक्रियो वेला कदाचिदनयत् कृती ।। १९१॥ वीणावाद्येन हृद्येन गीतैर्मुरजवादनैः । कदाचिद्धनदानीतभूषावस्वावलोकनैः ॥ १९२ ॥ वादिप्रवाद्युपन्यस्तपक्षादिसुपरीक्षणैः । कुतूहलेक्षणायातभव्यलोकात्मदर्शनैः ॥ १९३ ॥ धर्मादयो व्यवद्धुत गुणाः पापाद्ययात्क्षयम् । कौमारेऽस्मिन् स्थितेऽप्येवं किं वायं संयमे सति ॥१९॥ इति द्विलक्षपञ्चाशत्सहस्रप्रमितैर्गतैः । पूर्व राज्याभिषेकाप्त्या परमानन्दसुन्दरः ॥ १९५॥ नावतो मण्डलं राहोः स्वहस्ततलसस्मितम् । किं तेजोऽर्कस्य तेजोऽस्य तेजबैलोक्यरक्षिणः ॥ १९६ ॥ शक्रादयोऽपि कैक्चर्य जन्मनः प्राग्वहन्ति चेत् । ऐश्वर्यादिभिरेषोऽन्यैर्वृतः कैरुपमीयताम् ॥१९॥ तले कपोलयोः स्त्रीणां छेदे वा दन्तिदन्तयोः । स विलोक्य स्मरस्मेरं स्वमुखं सुखमेयिवान् ॥ १९८ ॥ थी इसलिए 'भोगभूमि लौट आई है। यह समझ कर लोग संतुष्ट होने लगे थे॥१८५ ॥ (ये बाल्य अवस्थासे ही अमृतका भोजन करते हैं अतः इनके शरीरकी कान्ति मनुष्योंसे भिन्न है तथा अन्य सबकी कान्तिको पराजित करती है।) उनके शरीरकी कान्ति ऐसी सुशोभित होती थी मानो सूर्य और चन्द्रमाकी मिली हुई कान्ति हो। इसीलिए तो उनके समीप निरन्तर कमल और कुमुद दोनों ही खिले रहते थे ।। १८६ ॥ कुन्दके फूलोंकी हँसी उड़ानेवाले उनके गुण चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल थे । इसीलिए तो वे भव्य जीवोंके मनरूपी नीलकमलोंके समूहको विकसित करते रहते थे ।। १८७॥ लक्ष्मी इन्हींके साथ उत्पन्न हुई थी इसलिए वह इन्हींकी बहिन थी। 'लक्ष्मी चन्द्रमाकी बहिन है। यह जो लोकमें प्रसिद्धि है वह अज्ञानी लोगोंने मिथ्या कल्पना कर ली है ॥ १८८ ।। जिस प्रकार चन्द्रमाका उदय होने पर यह लोक हर्षित हो उठता है, सुशोभित होने लगता है और निराकुल होकर बढ़ने लगता है उसी प्रकार सब प्रकारके संतापको हरनेवाले चन्द्रप्रभ भगवानका जन्म होने पर यह सारा संसार हर्षित हो रहा है, सुशोभित हो रहा है और निराकुल होकर. बढ़ रहा है ।। १८६ ॥ 'कारणके अनुकूल ही कार्य होता है। यदि यह लोकोक्ति सत्य है तो माननी पड़ता है कि इनकी लक्ष्मी और कीर्ति इन्हींके गुणोंसे निर्मल हुई थीं। भावार्थ-उनके गुण निर्मल थे अतः उनसे जो लक्ष्मी और कीर्ति उत्पन्न हुई थी वह भी निर्मल ही थी ।। १६०॥ जो बहुत भारी पभूतिसे सम्पन्न है, जो स्नान आदि माङ्गलिक कायोंसे सजे रहते है और अलङ्कारोसे सुशोभित हैं ऐसे अतिशय कुशल भगवान् कभी मनोहर बीणा बजाते थे, कभी मृदङ्ग आदि बाजोंके साथ गाना गाते थे, कभी कुबेरके द्वारा लाये हुए आभूषण तथा वस्त्र आदि देखते थे, कभी वादी-प्रतिवादियोंके द्वारा उपस्थापित पक्ष आदिकी परीक्षा करते थे और कभी कुतूहलवश अपना दर्शन करनेके लिए आये हुए भव्य जीवोंको दर्शन देते थे इस प्रकार अपना समय व्यतीत करते थे।। १६ जब भगवान् कौमार अवस्थामें ही थे तभी धर्म आदि गुणोंकी वृद्धि हो गई थी और पाप आदिका क्षय हो गया था, फिर संयम धारण करने पर तो कहना ही क्या है ? ॥ १६४ ॥ इस प्रकार दो लाख पचास हजार पूर्व व्यतीत होने पर उन्हें राज्याभिषेक प्राप्त हुआ था और उससे वे बहुत ही हर्षित तथा सुन्दर जान पड़ते थे। १६५॥ जो अपनी हथेलीप्रमाण मण्डलकी राहुसे रक्षा नहीं कर सकता ऐसे सूर्यका तेज किस कामका? तेज तो इन भगवान् चन्द्रप्रभा था जो कि तीन लोककी रक्षा करते थे ।। १६६ ।। जिन जन्मके पहले ही इन्द्र आदि देव किङ्करता स्वीकृत कर लेते हैं ऐसे अन्य ऐश्वर्य आदिसे घिरे हुए इन चन्द्रप्रभ भगवानको किसकी उपमा दी जावे ? ॥ १७॥ वे १चन्द्रस्येवोदयस्यापि ल०।२ मान्या ल० । ३ मान्यमजनमङ्गलः ख०,ग० । सजं सावधानीकृतं मजन मङ्गलस्नानं यस्य सः इतिक-पुस्तके टिप्पगी। ४ सालङ्कारक्रियां ख०। ५ मुरजवादिभिः ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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