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________________ चतुःपञ्चाशत्तमं पर्व ५६ विलोकिनीनां कान्तानामुत्सुकानां विलासकृत् । त्यागीव स सुखी जातः स्ववक्त्ररसतर्पणात् ॥ १९९ ॥ नान्तरायः परं तस्य कान्तावक्त्राब्जवीक्षणे । जातपङ्केरुहाशङ्कभ्रमनिर्भमरैविना ॥ २०॥ मधुपैश्चपलैलोलैर्युक्तायुक्ताविचारकैः । मलिनैः किमकर्तव्यं प्रवेशो यदि लभ्यते ॥ २०१॥ खचतुष्केन्द्रियतूंक्तैः पूर्वैः साम्राज्यसम्पदः । चतुर्विंशतिपूर्वाङ्गैः सम्मितौ क्षणवत्सुखम् ॥ २०२॥ सत्यां प्रयाति कालेऽसावलङ्कारगृहेऽन्यदा। प्रपश्यन् वदनाम्भोज दर्पणागतमात्मनः ॥ २०३ ॥ 'तत्रावधार्यनिर्वेदहेतु कञ्चिन्मुखे स्थितम् । पातुकः पश्य कायोऽयमीतयः प्रीतयोऽप्यमूः ॥ २०४॥ किं सुखं यदि न स्वस्मात्का लक्ष्मीश्चेदियं चला । किं यौवनं यदि ध्वंसि किमायुयदि सावधि ॥२०५॥ सम्बन्धो बन्धुभिः कोऽसौ चेद्वियोगपुरस्सरः । स एवाहं त एवार्थास्तान्येव करणान्यपि ॥ २०६॥ प्रीतिः सैवानुभूतिश्च वृत्तिश्चास्यां भवावनौ । परिवृत्तमिदं सर्व पुनः पुनरनन्तरम् ॥ २०७ ॥ तत्र किं जातमप्येष्यत्काले किं वा भविष्यति । इति जाननहं चास्मिन्मोमुहीमि मुहुर्मुहुः ॥ २०८ ॥ अनित्ये नित्यबुद्धिमें दुःखे सुखमिति स्मृतिः। अशुचौ शुचिरित्यास्था परत्रात्ममतिर्यथा ॥ २०१॥ अविद्ययैवमाक्रान्तो दुरन्ते भववारिधौ। चतुर्विधोरुदुःखोग्रदुर्गदैराहितश्विरम् ॥ २१ ॥ इत्ययेनायतेनैवमायासित इवाकुलः । काललब्धि परिप्राप्य क्षुण्णमार्गजिहासया ॥२११॥ गुणात्य भावुको भाविकेवलावगमादिभिः । स्मरन्नित्याप सन्मत्या ४संफल्येव समागमम् ॥ २१२॥ स्त्रियोंके कपोल-तलमें अथवा हाथी-दाँतके टुकड़ेमें कामदेवसे मुसकाता हुआ अपना मुख देखकर सुखी होते थे ।। १६८ ॥ जिस प्रकार कोई दानी पुरुष दान देकर सुखी होता है उसी प्रकार शृङ्गार चेष्टाओंको करने वाले भगवान् , अपनी ओर देखनेवाली उत्सुक स्त्रियोंके लिए अपने मुखका रस समर्पण करनेसे सुखी होते थे ।। १६६ ।। मुखमें कमलकी आशङ्का होनेसे जो पास हीमें मँडरा रहे हैं ऐसे भ्रमरोंको छोड़कर स्त्रीका मुख-कमल देखनेमें उन्हें और कुछ बाधक नहीं था ॥ २००॥ चञ्चल सतृष्ण, योग्य अयोग्यका विचार नहीं करनेवाले और मलिन मधुप-भ्रमर भी (पक्षमें मद्यपायी लोग भी) जब प्रवेश पा सकते हैं तब संसारमें ऐसा कार्य ही कौन है जो नहीं किया जा सकता हो॥२०१ ॥ इस प्रकार साम्राज्य-सम्पदाका उपभोग करते हुए जब उनका छह लाख पचास हजार पूर्व तथा चौबीस पूर्वाङ्गका लम्बा समय सुख पूर्वक क्षणभरके समान बीत गया तब वे एक दिन आभूषण धारण करनेके घरमें दर्पणमें अपना मुख-कमल देख रहे थे॥२०२-२०३ ॥ वहाँ उन्होंने मुख पर स्थित किसी वस्तुको वैराग्यका कारण निश्चित किया और इस प्रकार विचार करने लगे।"देखो यह शरीर नश्वर है तथा इससे जो प्रीति की जाती है वह भी ईतिके समान दःखदायी है ॥२०४॥ वह सुख ही क्या है जो अपनी आत्मासे उत्पन्न न हो, वह लक्ष्मी ही क्या है जो चश्चल हो, वह यौवन ही क्या है जो नष्ट हो जानेवाला हो, और वह आयु ही क्या है जो अवधिसे सहित हो-सान्त हो । २०५ ॥ जिसके आगे वियोग होनेवाला है ऐसा वन्धुजनोंके साथ समागम किस कामका? मैं वही हूँ, पदार्थ वही हैं, इन्द्रियाँ भी वही है, प्रीति और अनुभूति भी व ही है, तथा प्रवृत्ति भी वही है किन्तु इस संसारकी भूमिमें यह सब बार-बार बदलता रहता है ॥२०६-२०७॥ इस संसारमें अब तक क्या हुआ है और आगे क्या होनेवाला है यह मैं जानता हूं, फिर भी बार बार मोहको प्राप्त हो रहा हूँ यह आश्चर्य है ॥ २०८ ।। मैं आज तक अनित्य पदार्थोंको नित्य समझता रहा, दुःखको सुख स्मरण करता रहा, अपवित्र पदार्थोंको पवित्र मानता रहा और परको आत्मा जानता रहा ॥२०६॥ इस प्रकार अज्ञानसे आक्रान्त हुआ यह जीव, जिसका अन्त अत्यन्त कठिन है ऐसे संसाररूपी सागरमें चार प्रकारके विशाल दुःख तथा भयङ्कर रोगोंके द्वारा चिरकालसे पीड़ित हो रहा है ।। २१०॥ इस प्रकार काल-लब्धिको पाकर संसारका मार्ग छोड़नेकी इच्छासे वे बड़े लम्बे पुण्यकर्मके द्वारा खिन्न हुएके समान व्याकुल हो गये थे ॥२११ ॥ आगे १ स्ववक्त्रसंतपणात् ल. (छन्दोभङ्गः)। २ तदावधार्य ल. । ३ भवावलौ ल० । ४ सकस्पेव ख.। ५ समागमे ब०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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