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________________ ६५० उत्तरपुराणम् कहते हैं । संक्षेपमें इसके काय, वचन और मन ये तीन भेद है। तेरहवें गुणस्थानमें मनो. योग और वचनयोगका नाश हो जानेपर अन्तमें काययोग को सूक्ष्म दशा रह जाती है, उसीसे सूक्ष्म क्रिया-प्रतिपातो. नामका तीसरा शुक्लध्यान होता है। अन्तमें यह सूक्ष्म काय योग भी नष्ट हो जाता है ४८०५२ [7] रत्नचतुष्टय-१. रत्नमाला २. गदा ३. सीर-हल और ४. मूसल। ये बलभद्रके चार रत्न थे ७१।१२५ रत्नावली-एक उपवास । . रखावत-गृहस्वके द्वारा की जाने वाली एक पूजा ७३१५८ [ल] लक्षण-भगवान्के शरीरमें १०८ शुभ लक्षण होते हैं तथा मसूरिका आदि ९०० व्यञ्जन होते है । ५१५२ विपरीतमिथ्यात्व-जान, शेप और ज्ञायक तत्वोंको यथार्थता में विपरीत निर्णय करना ६२१३०१ विस्तारज-सम्यग्दर्शनका एक भेद ७४४४०,४४६ यावृस्यक्रिया-एक भावना ६३१३२६ [श] शक्तित्रय-१. उत्साह शक्ति २. मन्त्र शक्ति और ३. भुत्वशक्ति ४८१६ शीलवतानतीचार-एक भावना ६३३३२२ शुक्ललेश्य:-शुक्ललेश्या वालाकबायके उदयसे अनुरंजित योगोंको प्रवृत्तिको लेश्या कहते है। हमके १. कृष्ण २. नील ३. कापोत ४. पोत ५. पप और ६. शुक्ल ये छह भेद हैं। द्रव्यलेश्या और भावलेश्याकी अपेक्षा दो भेद हैं। ५११७ शुक्लध्यान-मोहकी अत्यन्त मन्दता अथवा मोहके अभाबमें होने वाला ध्यान शुक्लध्यान कहलाता है। इसके १. पृथक्य वितर्कवीचार २. एकत्व दितर्क ३. सूक्ष्मक्रिया प्रतिपाती और ४. व्युपरत. क्रिया निवति ये र भेद होते हैं ५४॥२२६ [ ] षट्भमा-१. प्रत्यक्ष २. अनुमान ३. शब्द ४. उपमान ५. अर्थापत्ति और ६. अभाव ये छह प्रमाण है ७४५१४ पडावश्यक-१. समता २. वन्दना ३. स्तुति ४.प्रतिक्रमण ५. ध्याय और ६. कायोसर्ग ये षडावश्यक कहलाते षष्ठोपवास-दो दिनका उपवास ४८।३९ पाइगुण्य-१. सन्धि २. विग्रह ३. यान ४. आसन ५. देशो. भाव और ६. समाश्रय-बड़े राजाका आथय लेना ये छह गुण है ५०१५ . षोडशस्वप्न-तीर्थकरके गर्भमें आनेके पूर्व उनको माताको दिलने वाले सोलह सप्न१. ऐरावत हाथी २. सफेद बैल ३. सिंह ४. लक्ष्मीका अभिषेक ५. दो मालाएं. सूर्यमण्डल ७. चन्द्रमण्डल ८. मनोहर मछलियोंका युगल ९. सुवर्ण कलश युगल १०. कमलोंमे सुशोभित सरोवर ११. लहराता हुमा समुद्र १२. सिंहासन १३. सुन्दर देव विमान १४, नागेन्द्र भवन १५, रत्नराशि और १५.देवीप्यमान अग्नि ४९।२२ 1 [स] समा-बीच-बीच में मातप-धूप प्रकट करनेवाले मेवोंका साठ दिन तक बरसना समावृष्टि कहलाती है ५८।२७ समाधि-एक भावना ६३१३२५ समुच्छिन्नक्रियापाति- चौथा शुक्लध्यान । यह ध्यान १४वें गुणस्थान होता है ५२०६७ संक्षेप-सम्यग्दर्शनका एक भेद ७४१४४०,४४५ सप्तपरमस्थान-१. सज्जातित्व २. सद्गृहस्थत्व ३. पारिवाज्य ४. सुरेन्द्रता ५. साम्राज्य ६. परमार्हन्त्य और ७. परमनिर्माण ६३३२५७ सप्तप्रकृति-१. स्वामी २. अमात्य ३. जनस्थान ४. कोश ५. दर-सेना ६. सुरक्षाके साधन और ७.मित्रवर्ग६८।७२ वर्गत्रितब-धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थोंका समूह त्रिवर्ग अथवा वर्गत्रितय कह. लाता है। मोक्ष पुरुषार्थ उक्त त्रिवर्गसे पृथक् होनेके कारण अपवर्ग कहा जाता है ५११८ वात्सल्य-सम्यग्दर्शनका एक बङ्ग ६३।३२० वात्सल्य-एक भावना ६३१३३० विनयसम्पमता-एक भावना ६३१३२१ विनयमिथ्याव-सब देवोंको एक सा मानना तथा सब वस्तुबोंको मुक्तिका उपाय समझमा विनयमिथ्यात्व है। ६२।३०२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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