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________________ सप्तप्रकृति संचय-१. मिथ्यात्व २. सम्यमिथ्यात्व ३.मम्यक्त्व और अनन्तानुबन्धी १. क्रोध २. मान ३. माया ओर ४. लोभ ये मात प्रक्रतियां हैं। ६२।३१७ सप्त रत्न-१. चक्र २. शक्ति ३. गदा ४. शंख ५. धनुष ६. दण्ड चौर ७. नन्दक (खड्ग) ये कृष्णके सात रत्न थे ७१।१२४ सर्वतोभद्र-एक उपवासका वा ७३।२८ सर्वतोमद-गृहस्थके द्वारा की जानेवाली एक विशिष्ट पूजा ७३१५८ संज्वलन-यथाख्यात चारित्रको पातनेवालो एक कपाया चारित्र. मोहके भेद, कषाय वेदनीयके चार भेद है-१. अनन्ता . पारिभाषिक शब्दकोष नुबन्ध-सम्यक्त्वको धातनं वाली सामादि-साम, दाम, और कपाय २. अप्रत्याख्यानाबरण- भेद ये पार उपाय प्रसिद्ध है देश पारित्रको पातनेवाली ६२।३२ कपाय ३. प्रत्याख्यानावरण- सिनिय-१. उत्साह सिद्धि सकल चारित्रको पातवेवाली २. मन्त्र सिटि बोर ३. कपाय और ४. संज्वलन प्रभुत्व सिद्धि ४८६ यथास्यात चारित्रको पातने सिंहनिजीदिन-मुनियोंके तप. बालीकषाय ४८1८ का एक भेद १६२ संयमासंयभ-त्रय हिंसाका त्याग होनेसे संयम बोर स्थावर सूक्ष्मध्यान-शुक्लव्यानका तीसरा भेद। जिसका पूर्णनाम हिसाका त्याग न होनेसे सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती है। यह बसंयम । इस प्रकार पंचम ध्यान तेरहवें गुणस्थानके अन्त. गुणस्थानको अवस्था संयमा में होता है ४८1५२ संयम कहलाती है ५९।२१४ संवेग-एक भावना ६३३३२३ सूत्रसमुजब-सम्यग्दर्शनका एक संशय मिध्यान्व-अ., बागम भेद ७४४९,४४ बादि नाना तत्त्वोंमें बाकी स्थाहाद-पदार्थ में रहनेवाले जो चंचलता है उसे संशय परस्पर विरोधीधाम विवक्षा. मिथ्यात्व कहते है ६२।२९९ बश प्रधानतासे किसी एका संसक-एक प्रकारके भ्रष्ट मुनि कथन करना स्याहार कहा जाता है ५१०९ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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