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________________ प्रशस्तिः ५७६ कोऽप्यस्मिन्कवितागुणोऽस्ति कवयोऽप्येतद्वचोब्जालयः कोऽसावत्र कविः कवीन्द्रगुणभद्राचार्यवर्यः स्वयम् ॥ ४३ ॥ इत्याचे भगवद्गृणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण-महापुराणसंग्रहे प्रशस्तिव्यावर्णनं नाम सप्तसप्ततितमं पर्व ॥ ७७ ॥ मनोहर हैं, यह त्रेशठ शलाकापुरुषोंका व्याख्यान है, चरित्र वर्णन करनेका मानो समुद्र ही है, इसमें कोई अद्भुत कविताका गुण है, और कविलोग भी इसके वचनरूपी कमलों पर भ्रमरोंके समान आसक्त हैं, यथार्थमें इस ग्रन्थके रचयिता श्रीगुणभद्राचार्य स्वयं कोई अद्भुत कधि हैं ।।४।। इस प्रकार ऋषि प्रणीत भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें प्रशस्तिका वर्णन करनेवाला सतहत्तरहाँ पर्व पूर्ण हुआ। पुराणाब्धिरगम्योऽयमर्थवीचिविभूषितः । सर्वथा शरणं मन्ये गुणभद्रं महाकविम् ।। पारग्रामो जन्मभूमिर्यदीया गल्लीलालो जन्मदाता यदीयः। पन्नालालः स्वल्पबुद्धिः स चाहं टीकामेतामल्पबुद्धया चकार ।। मधुमासासितपक्षे शुक्र वारेऽपराह्णवेलायाम् । शून्याष्टचतुर्युग्म-वर्षे वीराब्दसंज्ञिते पूर्णा ।। ते ते जयन्तु विद्वान्सो वन्दनीयगुणाकराः । यत्कृपाकोणमालम्ब्य तीर्णोऽयं शास्त्रसागरः ।। येषां कृपाकोमलदृष्टिपातैः सुपुष्पिताभून्ममसूक्तिवल्ली। तान्प्रार्थये वर्णिगणेशपादान् फलोदय तत्र नतेन मूर्ना ॥ यस्यानुकम्पामृतपानतृप्ता बुधा न हीच्छन्ति सुधासमूहम् । भूयात्प्रमोदाय बुधाधिपानां गुणाम्बुराशिः स गुरुगणेशः ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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