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________________ ५७० महापुराणे उत्तरपुराणम त्वामस्तरागमखिलावगमन्च कस्य न स्थापयेन्मनसि मन्मथमानमदिन ॥ ५१६॥ किं वस्त्विहाक्षणिकमन्वयरूपमस्ति ब्यस्तान्वयं वद हि किं क्षणिकच किश्चित् । बुद्धादयो बुधप गर्भगतार्भकाभा भेदोऽयमर्थविमुखोवगमो शमीषाम् ॥ ५६७ ॥ तिष्ठत्यगोचरमनन्तचतुष्टयं ते स्वाभाविकाचतिशयेष्वपरोऽपि कश्चित् । कस्यापि सम्भवति किं कपिलादिकानां केनाप्तपडिकमुपयान्ति तपस्विनोऽमी ॥ ५१८॥ स्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांसं ध्वस्तनिवेदमपि कि परमाणसङ्गात् । किं मोहमल्लदहनाकिमनन्तवीर्यात् किं सिद्धतापरिणतेर्गुणगौरवाद्वा ॥ ५६९ ॥ देहत्रयापनयनेन विनापि सिद्धि एवं शुद्धिशक्तयतुलवृत्त्युदितोदितत्वात् । . आधिक्यमस्त्यधिपते स्वदुदीरितोर सन्मार्गगाम्नयसि यत्परमात्मभावम् ॥ ५७०॥ और आपके वचन पदार्थके यथार्थ स्वरूपको देखनेवाले हैं यदि कदाचित् ये दोनों ही नेत्र और कर्ण इन्द्रियके विषय हो जावें तो वे दोनों ही, रागद्वेषसे रहित तथा समस्त पदार्थोको जाननेवाले आपको किसके मनमें शीघ्र ही स्थापित नहीं कर देंगे अर्थात् सभीके मनमें स्थापित कर देंगे। भावार्थ-आपका निर्विकार शरीर देखकर तथा पदार्थके यथार्थ स्वरूपका निरूपण करनेवाली आपकी वाणी सुनकर सभी लोग अपने हृदयमें आपका ध्यान करने लगते हैं। आपका शरीर निर्विकार इसलिए है कि आप वीतराग हैं तथा आपकी वाणी पदार्थका यथार्थ स्वरूप इसलिए कहती है कि आप सब पदार्थों को जाननेवाले हैं-सर्वज्ञ हैं ॥५६६ ॥ हे विद्वानोंके पालक ! क्या इस संसारमें वस्तुका स्वरूप अन्वय रूपसे नित्य है अथवा निरन्वय रूपसे क्षणिक है। कैसा है सो कहिए, इसका स्वरूप कहनेमें बुद्धादिक गर्भ में बैठे हुए बच्चेके समान हैं, वास्तविक बात यह है कि इन सबका ज्ञान पदार्थज्ञानसे विमुख है ।। ५६७ ।। हे देव ! आपका अनन्तचतुष्टय कपिलादिके विषयभूत नहीं है यह बात तो दूर रही परन्तु निःस्वेदत्व आदि जो आपके स्वाभाविक अतिशय हैं उनमेंसे क्या कोई भी कपिलादिसे किसी एकके भी संभव है ? अर्थात् नहीं है; फिर भला ये बेचारे कपिलादि प्राप्तकी पंक्तिमें कैसे बैठ सकते हैं । आप्त कैसे कहला सकते हैं ? ॥५६८ ।। हे भगवन् ! यद्यपि आपने तीनों वेदोंको नष्ट कर दिया है फिर भी मुनिगण आपको परमपुरुष कहते हैं सो क्या परमौदारिक शरीरकी संगतिसे कहते हैं ? या मोह रूपी लताके भस्म करनेसे कहते हैं ? या सिद्धता गुणरूप परिणमन करनेसे कहते हैं या गुणोंके गौरवसे कहते हैं ? ॥ ५६६ ॥ हे भगवन् ! यद्यपि अभी आपने औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंको नष्ट नहीं किया है तो भी शद्धि, शक्ति और अनुपम धैर्यके सातिशय प्रकट होनेसे श्राप सिद्ध हो चुके हैं। हे स्वामिन् । आप अपने द्वारा कहे हुए विशाल एवं समीचीन मार्गमें चलनेवाले लोगोंको परमात्म-अवस्था प्राप्त १ तपःस्थिनोऽपि क०, ख., ग०, ५०, म० । २ सङ्गम् क०, ख०, ग०,५०। ३-मप्यधिपते क०, ख, ग, म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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