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________________ षट्सप्ततितमं प Jain Education International अस्स्येव देव तव चौदयिकोऽपि भावः योगानुरोधसमवाप्तशुभाणुवेद्य त्वत्पादपङ्कजपडङ्घ्रितयाप्तपुण्याद् आनम्र मौलिरत एव नखोन्मुखांशु किं स्वेष मोहरहितस्य न बन्धहेतुः । बन्धं निबन्धनमुशन्त्यविरोधकत्वात् ॥ ५७१ ॥ गण्योऽभवत्सुरगणो गणनातिगश्रीः । भास्वन्मुखः शतमखः सुमुखस्तवान्योः ॥ ५७२ ॥ मालिनी प्रशमपरमकाष्ठानिष्ठितोदात्तमूर्तेः द्वितयनयमयोद्यद्धीरदिव्यध्वनेस्ते क्रमकरणविहीनज्ञानधामैकधाम्नः । ननु जिन परमात्मप्राभवं भाति भतुः ॥ ५७३ ॥ शार्दूलविक्रीडितम् ज्ञानं सर्वगतं स्वरूपनियतं ते स्यादहेतुः कृते वतेच्छायतनाः स्वकृत्यपटयो वाचो विवाचामपि । प्रस्थानस्थित योऽप्यनात्मविहिता मात्मान्यबाधाप्रदाः स एवं निर्मलबोधदर्पणतले ज्ञेयाकृतिं धत्स्व मे ॥ ५७४ ॥ विश्वस्यास्खलितं प्रशास्ति तव वाग्याथात्म्यमात्मेशिनो यस्माद्द्दष्टविरोधरोधरहिता रागाद्यविद्याच्छिदः । करा देते हैं यही आपकी सबसे अधिक विशेषता है ।। ५७० ।। हे देव ! यद्यपि आपके औदयिक भाव है परन्तु चूँकि आप मोहसे रहित हैं अतः वह बन्धका कारण नहीं है मात्र योगोंके अनुरोधसे आपके सातावेदनीय नामक पुण्य प्रकृतिका थोड़ा-सा बन्ध होता है पर वह आपका कुछ भी विघात नहीं कर सकता इसलिए आपको यथार्थमें बन्धरहित ही कहत हैं ।। ५७१ ।। हे भगवन्! आपके चरण-कमलोंका भ्रमर बननेसे जो पुण्य प्राप्त हुआ था उसीसे यह देवताओंका समूह गणनीय ( माननीय ) गिना गया है और उसी कारण से उसकी लक्ष्मी संख्याके बाहर हो गई है। यही कारण है कि नखोंकी ऊपरकी ओर उठनेवाली किरणोंसे जिसका मुख देदीप्यमान हो रहा है ऐसा यह इन्द्र मुकुट झुका कर आपके चरणोंके सम्मुख हो रहा है - आपके चरणोंकी ओर निहार रहा है ॥५७२ ॥ हे जिनेन्द्र ! आपका उत्कृष्ट शरीर प्रथम भावकी चरम सीमासे परिपूर्ण है, आप क्रम तथा इन्द्रियोंसे रहित केवलज्ञानरूपी तेजके एक मात्र स्थान हैं, आपकी गम्भीर दिव्यध्वनि निश्चय और व्यवहारनसे परिपूर्ण होकर प्रकट हुई है तथा आप सबके स्वामी हैं इसलिए हे नाथ ! आपके परमात्मपदका प्रभाव बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा है ।। ५७३ ।। हे भगवन् ! यद्यपि आपका ज्ञान सर्वत्र व्याप्त है तो भी स्वरूपमें नियत है और वह किसी कार्यका कारण नहीं है । आपकी वाणी इच्छा के बिना ही खिरती है तो भी वचनरहित (पशु आदि) जीवों का भी आत्मकल्याण करनेमें समर्थ है। इसी प्रकार आपका जो विहार तथा ठहरना होता है वह भी अपनी इच्छासे किया हुआ । नहीं होता है और वह भी निज तथा पर किसीको भी बाधा नहीं पहुँचाता है। ऐसे हे देव ! आप मेरे निर्मलज्ञानरूपी दर्पणके तलमें ज्ञेयकी प्रकृतिको धारण करो अर्थात् मेरे ज्ञानके विषय होओ ॥ ५७४ ।। हे भगवन् ! आप आत्माके स्वामी हैं - अपनी इच्छाओंको अपने अधीन रखते हैं तथा आपने रागादि अविद्याओंका उच्छेद कर दिया है इसलिए आपके वचन प्रत्यक्षादि विरोध से २ दृष्टिविरोधरोधविहिता ल० । १-मसत्यविरोधसत्वात् क०, ग०, घ० । ५७१ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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