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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् त्वां दुःखिनं सुखिनमप्युभयव्यपेतं तेनैव दुर्गमतमोऽसि नयानभिज्ञैः ॥ ५५॥ संयोगजः स्वज इति द्विविधो हि भावो जीवस्य योगविगमाद्विगमी तदुस्थः । स्वोत्थे स्थितिः परमनितिरेप मार्गो दुर्ग: परस्य तव वाक्यबहिष्कृतस्य ।। ५५७ ॥ आस्तामनादि निगलच्छिदया ददासि यन्मुक्तिमन्तरहितां तदिहालमेषा । स्नेहादिहेतुविनिवृत्तसमस्तसत्त्व सम्पालनप्रवणतैव तवाप्ततायै॥ ५५८ ॥ बोधस्तवाखिलविलोकनविभ्रमी किं किं वाग्मितामितपदार्थनिरूपणायाम् । कि स्वार्थसम्पदि परार्थपराङ्मुखस्त्वं किं नासि सत्सु जिन पूज्यतमस्त्वमेव ॥ ५५९ ॥ विश्वावलोकनवितन्वदनन्तवीर्य व्यापारपारसरणं न कदापि ते स्यात् । चित्रं तथापि सुखिनां सुखिनं भवन्तं सन्तो वदन्ति किमु भक्तिरुतावबोधः ॥ ५६० ॥ है उसकी अपेक्षा अन्तसहित हैं। द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा सामान्य जीवत्वभावसे आप न आदि हैं और न अन्त हैं अतः आप आदि और अन्त दोनोंसे रहित हैं। हिंसादि पापोंका आपत्याग कर चुके हैं अतः अनवद्य हैं-निष्पाप हैं और असातावेदनीय आदि कितनी ही पाप प्रकृतियोंका उदय अरहन्त अवस्थामें भी विद्यमान है अतः सावध हैं-पाप प्रकृतियोंसे सहित हैं। अरहन्त अवस्थामें असातावेदनीयका उदय विद्यमान रहनेसे कारणकी अपेक्षा आप दुखी हैं, मोह कर्मका अभाव हो जानेसे अाकुलताजन्य दुःख नष्ट हो चुका है इसलिए सुखी हैं, और आप अव्यावाधगुणसे सहित हैं अतः सुखी और दुखी इन दोनों व्यवहारोंसे रहित हैं। इस प्रकार भिन्नभिन्न नयोंकी अपेक्षा आप अनेक रूप हैं। जो इस नयवादको नहीं समझता है वह आपके इन विविध रूपोंको कैसे समझ सकता है ? ॥ ५५६॥ हे देव! जीवोंके भाव दो प्रकारके हैं एक संयोग से उत्पन्न होनेवाले और दूसरे स्वाभाविक । जो संयोगसे उत्पन्न होनेवाले भाव हैं वे संयोगके नष्ट हो जानेपर नष्ट हो जाते हैं, उनके नष्ट होनेसे ज्ञानादिक स्वाभाविक भावोंमें आत्माकी जो स्थिति है वही परमनिर्वृति या परम मुक्ति कहलाती है परन्तु यह मार्ग आपके वचनोंसे दूर रहनेवाले अन्य दर्शनकारोंको कठिन है ।। ५५७ ।। हे भगवन् ! आप अनादि कर्मबन्धनको छेदकर जो अन्तरहित मक्ति प्रदान करते हैं वह बात तो दूर ही रही किन्तु स्नेह आदि कारणोंसे रहित होकर भी समस्त प्राणियों की रक्षा करने में जो आपकी दक्षता है वही आपकी प्तता सिद्ध करनेके लिए बहुत है ।। ५५८ ।। हे भगवन ! क्या आपका ज्ञान समस्त पदार्थों के देखनेके कौतूहलसे सहित नहीं है ? क्या अपरिमित पदार्थों के निरूपण करने में आपकी वचन-कुशलता नहीं है ? क्या परपदार्थोंसे पराङमुख रहनेवाले आप स्वार्थरूप सम्पदाके सिद्ध करने में समर्थ नहीं हैं और क्या सजनों के बीच एक आप ही पूज्य नहीं हैं? ॥ ५५६ ।। हे नाथ ! समस्त संसारको देखने के लिए फैलनेवाले आपके अनन्तवीर्यके व्यापारका पार कभी नहीं प्राप्त किया जा सकता है तो भी आश्चर्य है कि सज्जन लोग आपको ही सुखियों में सबसे अधिक सुखी बतलाते हैं परन्तु उनकी यह भक्ति है अथवा यथार्थज्ञान Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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