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________________ षट्सप्ततितमं Jain Education International धीः पौरुषञ्च विजयार्जनमेव येषां सौख्यञ्च विश्वविषया विश्तोपभोगः । तेषां कथं तदुभयप्रतिपक्षरूपं त्वच्छासनं श्रवणभिज्जिन मा जनिष्ट ॥ ५५२ ॥ पुण्यं स्वया जिन विनेयविधेयमिष्टं गत्यादिभिः परमनिर्वृतिसाधनत्वात् । नैवामराखिलसुखं प्रति तच्च यस्माद् बन्धप्रदं विषयनिष्ठमभीष्टघाति ॥ ५५३ ॥ कायादिकं 'सदसि ते विफलं किलाहु नैतद्वचस्तव निशम्य निशाम्य साक्षात् । त्वां यान्ति निर्वृतिमिहैव विनेयमुख्या मुख्यं फलं ननु फलेषु परोपकारः ॥ ५५४ ॥ यलक्षणक्षतिकृदात्मनि तद्धि कर्म नामादिकं किमु निहन्ति तवोपयोगम् । तरसत्तया जिन भवन्तमसिद्धमिच्छ. न्निच्छेदनूर्ध्वगमनादतनोरसिद्धिम् ॥ ५५५ ॥ साद्यन्तहीनमनवद्यमनादिसान्तं सावयमादिरहितानवसानमाहुः । हे जिन ! विषयोंका अर्जन करना ही जिनकी बुद्धि अथवा पुरुषार्थ रह गया है तथा समस्त विषयों का निरन्तर उपभोग करना ही जिन्होंने सुख मान रखा है उन दोनोंसे विरुद्ध रहनेवाला आपका शासन, उन लोगोंके कानको फोड़नेवाला क्यों नहीं होगा ? अवश्य होगा ।। ५५२ ।। हे जिनेन्द्र ! आपने जिस पुण्यका उपदेश दिया है वही ज्ञान आदिके द्वारा परम निर्वाणका साधन होनेसे इष्ट है तथा भव्य जीवोंके द्वारा करनेके योग्य है । देवोंके समस्त सुख प्रदान करनेवाला जो पुण्य है वह पुण्य नहीं है क्योंकि वह बन्धका देनेवाला है, विषयोंमें फँसानेवाला है और अभीष्ट (मोक्ष) का घात करनेवाला है ।। ५५३ ॥ हे भगवन्! समवसरण में आपके जो शरीरादिक विद्यमान हैं वे निष्फल नहीं हैं क्योंकि उत्तम शिष्य आपके वचन सुनकर तथा साक्षात् आपके दर्शन कर इसी लोकमें परम आनन्दको प्राप्त होते हैं सो ठीक ही है क्योंकि जितने फल हैं उन सबमें परोपकार करना ही मुख्य फल है ।। ५५४ ॥ हे भगवन् ! ज्ञान दर्शनादिरूप लक्षणोंका घात करनेवाला जो नामादि कर्म आपकी आत्मामें विद्यमान है वह क्या आपके उपयोगको नष्ट कर सकता है ? अर्थात् नहीं कर सकता । हे जिनेन्द्र ! आत्मामें कर्मों की सत्ता होनेसे जो आपको असिद्ध-मुक्त मानता है वह यह क्यों नहीं मानने लगता है कि निरन्तर ऊर्ध्वगमन न होनेसे शरीररहित सिद्ध भगवान् भी अभी सिद्धिको प्राप्त नहीं हुए हैं। भावार्थ - यद्यपि अरहन्त अवस्थामें नामादि कर्म विद्यमान रहते हैं परन्तु मोहनीयका योग न होनेसे वे कुछ कर सकने में समर्थ नहीं है अतः उनकी जीवन्मुक्त अवस्था ही मानने योग्य है ।। ५५५ ।। हे प्रभो ! गणधरादिक देव, आपको आदिसहित, अन्त रहित, आदिरहित, अन्तसहित, अनादि-अनन्त, पापसहित, पापरहित, दुःखी, सुखी और दुःख-सुख दोनोंसे रहित कहते हैं इसलिए जो मनुष्य नयोंसे अनभिज्ञ हैं वे आपको नहीं जान सकते हैं— उनके द्वारा आप अज्ञेय हैं । भावार्थ - आत्माकी जो सिद्ध पर्याय प्रकट होती है वह पहले से विद्यमान नहीं रहती इसलिए सिद्ध पर्यायकी अपेक्षा आप सादि हैं तथा सिद्ध पर्याय एक बार प्रकट होकर फिर कभी नष्ट नहीं होती इसलिए आप अन्तरहित हैं । आपकी संसारी पर्याय आदिरहित है अतः उसकी अपेक्षा अनादि हैं और कर्म क्षय हो जाने पर संसारी पर्यायका अन्त हो जाता १ सदपि इत्यपि क्वचित् । ५६७ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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