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________________ चतुःसप्ततितम पर्व ४७६ अभयाख्यः सुतो धीमानजनिष्ठास्त्वमीदृशः । अतः परं तपः कृत्वा जिनैर्द्वादशवोदितम् ॥ ५२६॥ अवाप्यसि पदं मुक्तरित्यसौ चावबुध्य तत् । अभिवन्द्य जिनं राज्ञा सह तुष्टोऽविशत्पुरम् ॥ ५२७ ॥ अथान्येधर्महाराजः श्रोणिकः सदसि स्थितः । अभयं सर्वशास्त्रज्ञं कुमारं वरवाग्मिनम् ॥ ५२८ ॥ तन्माहात्म्यप्रकाशार्थ तत्त्वं पप्रच्छ वस्तुनः । सोऽप्यासनविनेयत्वाद्वस्तुयाथात्म्यदशिंधीः ॥ ५२९ ।। स्वद्विजोत्सपिभाभारविभासितसभान्तरः । एवं निरूपयामास स्पष्टमृष्टेष्टगीर्गुणः ।। ५३०॥ यस्य जीवादिभावानां याथात्म्येन प्रकाशनम् । तं पण्डितं बुधाः प्राहुः परे नाम्नैव पण्डिताः ॥ ५३१ ।। जीवाद्याः कालपर्यन्ताः पदाथों जिनभाषिताः। द्रव्यपर्यायभेदाभ्यां नित्यानित्यस्वभावकाः ॥ ५३२ सर्वथात्मादितस्वानां मोहाग्नित्यत्वकल्पने । सर्वद्रव्येषु सम्भूतिः परिणामस्य नो भवेत् ॥ ५३३ ॥ क्षणिकत्वे पदार्थानां न क्रिया कारकञ्चन । न फलञ्च तथालोकव्यवहारविलोपनम् ॥ ५३४ ॥ नित्यत्वस्योपचारेण सत्वातस्य विलोपनम् । नो चेन्मिथ्योपचारेण कथं तथ्यस्य साधनम् ॥ ५३५ ॥ धर्मद्वयोपलम्भाभ्यां दृष्टाऽप्यर्थक्रियां ब्रुवन् । भ्रान्तमन्यतरं ब्रूयादन्यस्याप्रान्ततां कुतः ॥ ५३६ ॥ एकधर्मात्मकं सर्व वाग्छतोऽञ्चितवादिनः । सामान्येतरसम्भूतौ कुतः संशयनिर्णयौ ॥ ५३७ ।। प्रतीयमानज्ञानाभिधानासत्याभिधायिनः । तयोरसत्यज्ञानाभिधानयोः केन सत्यता ॥ ५३८ ॥ सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ और वहां देवोंके सुख भोग कर आयुके अन्तमें अपने पुण्यके उदयसे यहां राजा श्रेणिकके तू अभय नामका ऐसा बुद्धिमान् पुत्र उत्पन्न हुआ है । अागे तू श्री जिनेन्द्रदेषका कहा हुआ बारह प्रकारका तपश्चरण कर मुक्तिका पद प्राप्त करेगा। यह सब जानकर अभयकुमार बहुत ही सन्तुष्ट हुआ और श्रीजिनेन्द्र भगवानको नमस्कार कर राजा श्रेणिकके साथ नगरमें चला गया ॥ ५२१-५२७ ॥ अथानन्तर किसी एक दिन महाराज श्रेणिक राजसभामें बैठे हुए थे वहां उन्होंने समस्त शास्त्रोंके जानने वाले श्रेष्ठ वक्ता अभय कुमारसे उसका माहात्म्य प्रकट करनेकी इच्छासे तत्त्वका यथार्थ स्वरूप पूछा। अभय कुमार भी निकटभव्य होनेके कारण वस्तुके यथार्थ स्वरूपको देखने बाला था तथा स्पष्ट मिष्ट और इष्टरूप वाणीके गुणोंसे सहित था इसलिए अपने दाँतोकी फैलने वाली कान्तिके भारसे सभाके मध्यभागको सुशोभित करता हुआ इस प्रकार निरूपण करने लगा ॥५२८-५३० ।। आचाय कहते हैं कि जिसे जीवादि पदार्थोंका ठीक-ठीक बोध होता हैं विद्वान् लोग उसे ही पण्डित कहते हैं बाकी दूसरे लोग तो नाममात्रके पण्डित कहलाते हैं ॥५३१ ॥ अभयकुमार कहने लगा कि जिनेन्द्र भगवान्ने जीवसे लेकर काल पर्यन्त अर्थात् जीव, पुङ्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह पदार्थ कहे हैं। ये सभी पदार्थ द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नयके भेदसे क्रमशः नित्य तथा अनित्य स्वभाव वाले हैं ॥ ५३२ ।। यदि जीवादि पदार्थोंको अज्ञान वश सर्वथा नित्य मान लिया जावे तो सभी द्रव्योंमें जो परिणमन देखा जाता है वह संभव नहीं हो सकेगा ॥५३३ । इसी प्रकार यदि सभी पदार्थोंको सर्वथा क्षणिक मान लिया जावे तो न क्रिया बन सकेगी, न कारक बन सकेगा, न क्रियाका फल सिद्ध हो सकेगा और लेन-देन आदि समस्त लोक-व्यवहार का सर्वथा नाश हो जावेगा ॥ ५३४ ॥ कदाचित् यह कहा जाय कि उपचारसे पदार्थ नित्य है इसलिए लोकव्यवहारका सर्वथा नाश नहीं होगा तो यह कहना भी ठीक नहीं हैं क्योंकि उपचारसे सत्य पदार्थकी सिद्धि कैसे हो सकती है ? आखिर उपचार तो अ..त्य ही है उससे सत्य पदार्थका निर्णय होना संभव नहीं है ॥ ५३५ ।। जब कि नित्य-अनित्य दोनों धर्मोंसे ही पदार्थकी अर्थ क्रिया होती देखी जाती है तब दो धर्मोमेंसे एकको भ्रान्त कहने वाला पुरुष दूसरे धर्मको अभ्रान्त किस प्रकार कह सकता है ? भावार्थ-जब अर्थ क्रियामें दोनों धर्म साधक हैं तब दोनो हीं अभ्रान्त हैं यह मानना चाहिये ।। ५३६॥ जो वादी समस्त पदार्थोंको एक धर्मात्मक ही मानते हैं उनके मतमें सामान्य तथा विशेषसे उत्पन्न होने वाले संशय और निर्णय, सामान्य और विशेष धर्मके आश्रयसे ही उत्पन्न होते हैं इसलिए जब पदार्थको सामान्य विशेष-दोनों रूप न मानकर एक रूप ही माना जायगा तो उनकी उत्पत्ति असंभव हो जायगी ॥ ५३७ ॥ पदार्थ उभय धर्मात्मक है ऐसा ही ज्ञान Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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