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________________ ४८० महापुराणे उत्तरपुराणम् गुणगुण्यभिसम्बन्ध सम्बन्धान्तरवादिनः । निस्सम्बन्धानवस्थाभ्युपेतहान्यनिवारणम् ॥ ५३९॥ तत्यक्त्वैकान्स दुर्वादगर्व सर्वज्ञभाषितम् । नित्यानित्यात्मकं तत्त्वं प्रत्येतव्यं मनीषिणा ॥ ५४०॥ 'सर्ववितन्मतश्रद्धा सम्यग्दर्शनमिष्यते । ज्ञातिस्तत्प्रोक्तवस्तूनां सम्यग्ज्ञानमुदाहृतम् ॥ ५४१ ॥ तदागमोपदेशेन योगत्रयनिषेधनम् । चारित्रं तत्त्रयं युक्तं मुक्त व्यस्य साधनम् ॥ ५४२ ॥ समेतमेव सम्यक्त्वज्ञानाभ्यां चरितं मतम् । स्यातां विनापि ते तेन गुणस्थाने चतुर्थके ॥ ५४३ ॥ काझेन कर्मणां कृत्वा संवरं निर्जरां पराम् । २प्रामोतु परमस्थानं विनेयो विश्वक'ततः ॥ ५४४ ॥ इति सर्व मनोहारिं श्रुत्वा तस्य निरूपणम् । वस्तुतत्वोपदेशेऽयं कुशलोऽभयपण्डितः ॥ ५४५ ॥ इति सर्वे समासीनास्तन्माहात्म्यं समस्तुवन् । समात्सर्या न चेत्के वा न स्तुवन्ति ४गुणान्सताम् ॥५४६॥ पृथिवीच्छन्दः धियोऽस्य सहजन्मना कुशलिनः कुशाग्रीयता श्रतेन कृतसंस्कृतेनिशिततानु चाम्यैव सा । होता है और ऐसा ही कहने में आता है फिर भी जो उसे असत्य कहता है सो उसके उस असत्य ज्ञान और असत्य अभिधानमें सत्यता किस कारण होती है ? भावार्थ-जिसका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है और लोकव्यवहारमें जिसका निरन्तर कथन होता देखा जाता है उसे प्रतिवादी असत्य बतलाता है सो उसके इस बतलानेसे सत्यता है इसका निर्णय किस हेतुसे होता है ? प्रती पदार्थको असत्य और अप्रतीयमान पदार्थको सत्य मानना युक्तिसंगत नहीं है॥५३८॥ पदार्थों में गुणगुणी सम्बन्ध विद्यमान है उसके रहते हुए भी जो बादी समवाय आदि अन्य सम्बन्धोंकी कल्पना करता है उसके मतमें सम्बन्धका अभाव होनेसे अभ्युपेत-स्वीकृत मतकी हानि होती है और अनवस्था दोषकी अनिवायेता आती है। भावार्थ-गणगणी सम्बन्धके रहते हा वादी समवाय आदि अन्य सम्बन्धोंकी कल्पना करता है उससे पूछना है कि तुम्हारे द्वारा कल्पित समवाय आदि सम्बन्धोंका पदार्थके साथ सम्बन्ध है या नहीं ? यदि नहीं है तो सम्बन्धका अभाव कहलाया और ऐसा माननेसे 'तुम्हारा जो स्वीकृत पक्ष है कि सम्बन्धरहित कोई पदार्थ नहीं है। उस पक्ष में बाधा आती है । इससे बचनेके लिए यदि यह मानते हो कि समवाय आदि सम्बन्धोंका पदार्थके साथ सम्बन्ध है तो प्रश्न-होता है कि कौन-सा सम्बन्ध है ? इसके उत्तरमें किसी दूसरे सम्बन्धकी कल्पना करोगे तो उस दूसरे सम्बन्धके लिए तीसरे सम्बन्धकी कल्पना करनी पड़ेगी इस तरह अनवस्था दोष अनिवार्य हो जावेगा॥ ५३६ ।। इसलिए बुद्धिमानोंको एकान्त मिथ्यावादका गर्व छोड़कर सर्वज्ञ भगवान्के द्वारा कहा हुआ नित्यानित्यात्मक ही पदार्थ मानना चाहिए ॥५४०॥ सर्वज्ञ और सर्वज्ञके द्वारा कहे हुए मतमें श्रद्धा रखना सम्यग्दर्शन है, सर्वज्ञके द्वारा कहे हुए पदार्थोंका जानना सो सम्यग्ज्ञान है और सर्वज्ञप्रणीत आगमके कहे अनुसार तीनों योगोंका रोकना सम्यक्चारित्र कहलाता है। ये तीनों मिलकर भव्य जीवके मोक्षके कारण माने गये हैं ॥ ५४१-५४२॥ सम्यक्चारित्र सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानसे सहित ही होता है परन्तु सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान चतुर्थगुणस्थानमें सम्यक्चारित्रके विना भी होते हैं ॥५४३ ।। इसलिए सम्यग्दृष्टि भव्य जीवको समस्त कर्मोंका उत्कृष्ट संवर और उत्कृष्ट निर्जरा कर मोक्ष रूप परमस्थान प्राप्त करना चाहिये ।। ५४४ ।। इस प्रकार मनको हरण करने वाला, अभयकुमारका समस्त निरूपण सुनकर सभामें बैठे हुए सब लोग कहने लगे कि यह अभयकुमार, वस्तुतत्त्वका उपदेश देनेमें बहुत ही कुशल पण्डित है। इस तरह सभी लोगोंने उसके माहात्म्यकी स्तुति की सो ठीक ही है क्योंकि ईर्ष्या रहित ऐसे कौन मनुष्य हैं जो सज्जनोंके गुणोंकी स्तुति नहीं करते ? ॥५४५-५४६।। इस बुद्धिमान्की बुद्धि जन्मसे ही कुशाग्र थी फिर शास्त्रके संस्कार और भी तेज होकर अनोखी हो गई १ सर्ववित् तन्मते श्रद्धा क०, ख०, ग०, घ० । २ प्राप्नोति इत्यपि क्वचित् । ३ प्ररूपणम् इत्यपि क्वचित् । ४ गुणात्मताम् ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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