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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् विप्रस्त्वं षट्प्रमावादी न चार्वाको न मां प्रति । प्रयोगोऽनभ्युपेतत्वादित्युक्तिर्घटते न ते ॥ ५१४॥ साध्यसाधनसम्बन्धो हेतुश्चाध्यक्षगोचरः । उहाद्वयाप्तिः कथं न स्यात्प्रयोगस्वां प्रति प्रमा ॥ ५१५॥ काचित्कव्यभिचाराच्चप्रत्यक्षेऽपि न सोऽस्ति किम् । नानुमानं प्रमेत्यार्य मुच्यतामयमाग्रहः ॥ ५१६ ॥ प्रत्यक्षमविसंवादि प्रमाणमिति चेत्कुतः । अनुमानेऽपि तन्नेष्टमनिष्ट किं क्षितीशिभिः ॥ ५१७॥ अस्तु साह्वयादिवादानामप्रामाण्यं विरोधतः । दृष्टेन तेन संवादसिद्धेर्वादस्य नार्हतः ॥ ५१८ ॥ इत्याहतोक्तं तत्तथ्यं श्रुत्वा सर्व द्विजात्मजः । त्वद्गहीतो ममाप्यस्तु धर्मोऽद्य प्रभृतीति सः॥५१९॥ तदाज्ञयाऽग्रहीधर्म निर्मलं जिनभाषितम् । सद्दचो हितमन्ते स्यादातुरायेव भेषजम् ॥ ५२०॥" अथ तौ सह गच्छन्तावटवीगहनान्तरे। पापोदयात्परिभ्रष्टमार्गो दिङ्मूढताङ्गतौ ॥ ५२१ ॥ देशकोऽस्ति न मार्गस्य वनमेतदमानुषम् । नास्ति कश्चिदुपायोऽत्र विहाय जिनभाषितम् ॥ ५२२॥ परिच्छेदो हि पाण्डित्यं शूरस्याहारदेहयोः। इति सन्न्यस्य सद्ध्यानेनासीनं श्रावक द्विजः ॥ ५२३ ॥ विलोक्य स्वयमप्येतदुपदेशेन 'शुद्धधीः । स्थित्वा तथैव सम्प्राप्तसमाधिर्जीवितावधौ ॥ ५२४ ॥ सौधर्मकल्पे देवोऽभूद्भक्त्वा तत्रामरं सुखम् । स्वायुरन्ते स्वपुण्येन श्रेणिकस्य महीपतेः ॥ ५२५ ॥ अभीष्ट सर्वज्ञ क्या सिद्ध नही हो जाता है ? अवश्य सिद्ध हो जाता है । इसलिए विद्वान् लोग सर्वज्ञ भगवान्के द्वारा कहे हुए वचनोंके विरुद्ध कोई बात स्वीकृत नहीं करते हैं ।। ५११-५१३ ॥ इसके सिवाय एक बात यह भी विचारणीय है कि हे प्रिय ! तुम प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और प्रभाव इन छह प्रमाणोंको मानने वाले मीमांसक हो, केवल प्रत्यक्षको मानने वाले चार्वाक नहीं हो अतः तुम्हारा मेरे प्रति यह कहा जाना कि अनुमानका प्रयोग मुझे स्वीकृत नहीं है। संगत नहीं बैठता ।। ५१४ ॥ साध्य-साधनके सम्बन्धको हेतु कहते हैं वह प्रत्यक्षका विषय है और अविनाभाव सम्बन्धसे उसकी व्याप्तिका ज्ञान होता है फिर आप अनुमानको प्रमाण क्यों नहीं मानते ? ॥ ५१५॥ यदि यह कहा जाय कि अनुमानमें कदाचित् व्यभिचार (दोष) देखा जाता है तो यह व्यभिचार क्या प्रत्यक्षमें भी नहीं होता ? अवश्य होता है। इसलिए हे आर्य ! 'अनुमान प्रमाण नहीं हैं। यह आग्रह छोड़िये ।। ५१६॥ यदि यह कहा जाय कि प्रत्यक्ष विसंवादरहित है इसलिए प्रमाणभूत है तो अनुमानमें भी तो विसंवादकाअभाव रहता है उसे भी प्रमाण क्यों नहीं मानते हो। युक्तिकी समानता रहते हुए एकको प्रमाण माना जाय और दूसरेको अप्रमाण माना जाय यदि यही आपका पक्ष है तो फिर राजाओंकी क्या आवश्यकता? अथवा सांख्य आदि दर्शनोंमें अप्रामाणिकता भले ही रहे क्योंकि उनमें विरोध देखा जाता है परन्तु अरहन्त भगवान्के दर्शनमें अप्रामाणिकता नहीं हो सकती क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाणसे उसका संवाद देखा जाता है। इस प्रकार साथके जैनी-श्रावकके द्वारा कहे हए समस्त यथार्थ तत्तवको सनकर ब्राह्मणने कहा कि जिस धर्मको आपने ग्रहण किया है वही धर्म आजसे मेरा भी हो ॥५.१७-५१३॥ श्रावककी आज्ञासे उस ब्राह्मणने जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहा हुआ निर्मल धर्म ग्रहण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार औषधि, बीमार मनुष्यका हित करती है उसी प्रकार सजन पुरुषके वचन भी अन्तमें हित ही करते हैं ।। ५२०॥ अथानन्तर वे दोनों ही साथ-साथ जाते हुए किसी सघन अटवीके बीचमें पापके उदयसे मार्ग भूल कर दिशाभ्रान्त हो गये ।। ५२१ ।। उस समय श्रावकने विचार किया कि चूँ कि यह वन मनुष्य रहित है अतः वहाँ कोई मार्गका बतलानेवाला नहीं है। इस समय जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए उपायको छोड़कर और कोई उपाय नहीं है। ऐसी दशामें आहार तथा शरीरका त्याग कर देना ही शूरवीरकी पण्डिताई है। ऐसा विचार कर वह संन्यासकी । उत्तमध्यानके लिए बैठ गया । श्रावकको बैठा देख उसके उपदेशसे जिसकी बुद्धि निर्मल हो गई है ऐसा ब्राह्मण भी समाधिका नियम लेकर उसी प्रकार बैठ गया। आयु पूर्ण होने पर वह ब्राह्मण १ युद्धधीः ख०, ग०, प.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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