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________________ ४४० महापुराणे उत्तरपुराणम निष्कम्र्प तव शुक्लतामुपगतं बोधं पयोधिर्महा वातोद्धततनुर्विनीलसलिलः प्राप्नोति दूरान तम् । ध्यानं ते वत वाचलस्य मरुतां श्वासानिलाद्वामरात् क्षोभः कः कथमित्यभीष्टुतिपतिः पार्श्वप्रभुः पातु नः ॥ १६२ ॥ तीर्थेशाः सदृशो गुणैरनणुभिः सर्वेऽपि धैर्यादिभिः सन्त्यप्येवमधीश विश्वविदितास्ते ते गुणाः प्रीणनाः । तत्सर्व कमठात्तथाहि महतां शत्रोः कृतापक्रियात् ख्यातिर्या महती न जातुचिदसौ मित्रात्कृतोपक्रियात् ॥ १६३ ॥ दूरस्थामरविक्रियस्य भवतो बाधा न शान्तात्मनो न क्रोधो न भयञ्च तेन न बुधैः सोढेति संस्तूयसे । माहात्म्यप्रशमौ तु विस्मयकरौ तौ तेन तीर्थेशिनः स्तोतव्यं किमिति स्तुतो भवतु नः पार्थो भवोच्छित्तये ॥१६॥ पश्यैतौ कृतवेदिनौ हि धरणौ धावितीडागन्ती तावेवोपकृतिर्न ते त्रिभुवनक्षेमैकभूमेस्ततः । भूभृत्पातनिषेधनं ननु कृतं चेत्प्राक्तनोपद्रवाः कैर्नासमिति सारसंस्तुतिकृतः पार्थो जिनः पातु नः ॥ १६५ ॥ भी अच्छी तरह बार-बार झूला झुला दिया था फिर भला यह शम्बर जैसा क्षुद्रदेव आपका क्या कर सकता है ? जिस प्रकार मच्छ समुद्रमें उछल-कूदकर उसे पीड़ित करता है परन्तु स्वयं उसी समुद्रसे जीवित रहता है- उससे अलग होते ही छटपटाने लगता है उसी प्रकार इस क्षुद्रदेवने आपको पीड़ा पहुँचाई है तो भी यह अन्तमें आपकी ही शान्तिसे अभ्युदयको प्राप्त हुआ है। इस प्रकार जिनकी स्तुति की गई वे पार्श्वनाथ स्वामी हम सबकी रक्षा करें ।। १६१ ।। 'हे प्रभो ! अकम्प हुआ आपका ज्ञान अत्यन्त निर्मलताको प्राप्त है उसे समुद्रकी उपमा कैसे दी जा सकती है क्योंकि समुद्र तो महावायुके चलनेपर चंचल हो जाता है और उसमें भरा हुआ पानी नीला है इस प्रकार .. समुद्र दूरसे ही आपके ज्ञानको नहीं पा सकता है। इसी तरह आपका. ध्यान भी अकम्प है तथा अत्यन्त शुक्लताको प्राप्त है उसे भी समुद्रकी उपमा नहीं दी जा सकती है । हे नाथ ! आप सुमेरु पर्वतके समान अचल हैं फिर भला श्वासोच्छ्वासकी वायुके समान इस क्षुद्रदेवसे आपको क्या क्षोभ हो सकता है ?” इस प्रकार अनेक स्तुतियोंके स्वामी पार्श्वनाथ भगवान् हमारी रक्षा करें ।। १६२ ।। हे स्वामिन् ! धैर्य आदि बड़े-बड़े गुणोंसे यद्यपि सभी तीर्थंकर समान हैं तथापि सबको संतुष्ट करनेवाले आपके जो गुण संसारमें सर्वत्र प्रसिद्ध हैं वे सब एक कमठके कारण ही प्रसिद्ध हुए हैं । सो ठीक ही है क्योंकि अपकार करनेवाले शत्रुसे महापुरुषोंकी जो ख्याति होती है वह उपकार करनेवाले मित्रसे कभी नहीं होती ? ॥ १६३ ॥ हे देव ! आपने शान्तचित्त रहकर शम्बर देवकी विक्रिया दूर कर दी उससे आपको न कोई बाधा हुई, न क्रोध आया और न भय ही उत्पन्न हुआ इस कारण 'आप सहनशील हैं। इस प्रकार विद्वज्जन आपकी स्तुति नहीं करते किन्तु आपका माहात्म्य और शान्ति आश्चर्यजनक है इसलिए आपकी स्तुति की जानी चाहिये। इस प्रकार जिनकी स्तुति की गई थी वे पार्श्वनाथ भगवान् हम सबके संसारका उच्छेद करनेवाले हों ॥१६४॥ देखो, ये धरणेन्द्र और पद्मावती दोनों ही बड़े कृतज्ञ हैं, और बड़े धर्मात्मा हैं इस प्रकार संसारमें स्तुतिको प्राप्त हुए हैं परन्तु तीनों लोकोंके कल्याणकी एकमात्र भूमि स्वरूप आपका ही यह उपकार है ऐसा समझना चाहिये । यदि ऐसा न माना जाय और दोनोंने ही पर्वतोंका पटकना आदि बन्द किया है ऐसा माना जाय तो फिर यह भी खोजना पड़ेगा कि पहले उपद्रव किसके द्वारा नष्ट हुए थे? इस प्रकार जिनकी सारभूत स्तुति की जाती है वे पार्श्वनाथ भगवान हम सबकी रक्षा करें ।। १६५ ।। हे विभो ! पर्वतका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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