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________________ त्रिसप्ततितम पर्व भेदोऽने फणिमण्डपः फणिवधूछन्नं क्षतिर्घातिना कैवल्याप्तिधातुदेहमहिमा हानिर्भवस्यामरी । भीतिस्तीर्थकृदुद्गमोऽपगमनं विघ्नस्य चासन्सम स सन्ततान्तकभयं हन्तूनवंशाग्रणीः ॥ १५६ ॥ किं ध्यानात्फणिनः फणीन्द्रयुवतेः क्षान्तेर्महेन्द्रात्स्वत ___स्तन्त्रान्मन्त्रविज़म्भणाद् वत रिपोर्भातेरयस्योदयात् । कालावृधातिहतेरिदं शममभूदित्यय॑हस्तैः सुरै राशङ्कयामरविघ्नविच्युतिर हन्यात्स धीरामणीः ॥ १६ ॥ श्रुत्वा यस्य वचोऽमृतं श्रुतिसुखं हृद्यं हितं हेतुम __ मिथ्यात्वं दिविजोऽवमीद्विषमिव व्याविद्धवैरोद्धरम् । यं स्तौति स्म च तादशोऽप्युपनतश्रेयः स पार्यो विभु वित्रौर्घ हरिसन्तासनशिखामध्यास्य सिद्धो हतात् ॥ १६८ ॥ जातः प्राङ्मरुभूतिरन्विभपतिर्देवः सहस्रारजो विशेशोऽच्युतकल्पजः क्षितिभृतां श्रीवानाभिः पतिः । देवो मध्यममध्यमे नृपगुणैरानन्दनामाऽऽनते" देवेन्द्रो हतघातिसंहतिरवत्वस्मान्स पार्श्वेश्वरः ॥ १६९ ।। फटना, धरणेन्द्रका फणामण्डलका मण्डप तामना, पद्मावतीके द्वारा छत्र लगाया जाना, घातिया कर्मोंका क्षय होना, केवलज्ञानकी प्राप्ति होना, धातुरहित परमौदारिक शरीरकी प्राप्ति होना, जन्ममरण रूप संसारका विघात होना, शम्बरदेवका भयभीत होना, आपके तीर्थकर नामकर्मका उदय होना और समस्त विघ्नोंका नष्ट होना ये सब कार्य जिनके एक साथ प्रकट हुए थे ऐसे उग्र वंशके शिरोमणि भगवान् पार्श्वनाथ सदा यमराजका भय नष्ट करें-जन्ममरणसे हमारी रक्षा करें॥१६६ ।। 'यह शान्ति, क्या भगवानके ध्यानसे हुई है ? वा धरणेन्द्रसे हुई है ?, अथवा पद्मावतीसे हुई है? अथवा भगवान्की क्षमासे हुई है ? अथवा इन्द्रसे हुई है ? अथवा स्वयं अपने आप हुई है ? अथवा मन्त्रके विस्तारसे हुई है ? अथवा शत्रुके भयभीत हो जानेसे हुई है ? अथवा भगवान्के पुण्योदयसे हुई है ? अथवा समय पाकर शान्त हुई है ? अथवा घातिया कर्मोंका क्षय होनेसे हुई है। इस प्रकार अर्घ हाथमें लिये हुए देव लोग, शंवरदेवके द्वारा किये हुए जिनके विघ्नोंकी शान्तिकी आशंका कर रहे हैं ऐसे धीर वीरोंमें अग्रगण्य भगवान् पार्श्वनाथ हमारे पाप नष्ट करें ।।१६७ ॥ कानोंको सुख देनेवाले, हृदयको प्रिय लगनेवाले, हित करनेवाले और हेतुसे युक्त जिनके वचन सुनकर शम्बरदेवने परम्परागत वैरसे उत्कट मिथ्यात्वको विषके समान छोड़ दिया, स्वयं आकर जिनकी स्तुति की और उस प्रकारका क्रूर होनेपर भी वह कल्याणको प्राप्त हुआ तथा जो इन्द्रके द्वारा धारण किये हुए सिंहासनके अग्रभाग पर विराजमान होकर सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुए ऐसे भगवान् पार्श्वनाथ हमारे विघ्नोंके समूहको नष्ट करें ॥ १६८ ॥ पार्श्वनाथका जीव पहले मरुभूति मंत्री हुश्रा, फिर सहस्त्रार स्वर्गमें देव हुआ, वहाँ से आकर विद्याधर हुआ, फिर अच्युत स्वर्गमें देव हुआ, वहाँ से आकर वननामि चक्रवर्ती हुआ, फिर मध्यम अवेयकमें अहमिन्द्र हुआ, वहाँ से आकर राजाओंके गुणोंसे सुशोभित आनन्द नामका राजा हुआ, फिर आनत स्वर्गमें इन्द्र हुआ और तदनन्तर घातिया १ मेदोहेः ल०।२-रधातु ल० । ३-राशाक्योऽमर ल०। ४ नौति स्म ल०। ५ नतोप०, म., क०, । ततो ख०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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