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________________ त्रिसप्ततितम पर्व ४३६ क तद्वैरं वृथा शान्तिरीदृशी कास्य पापिनः । सख्यमास्तां विरोधश्च वृद्धये हि महात्मभिः ॥ १४ ॥ गणेशा दश तस्यासन् विधायादि स्वयम्भुवम् । सार्धानि त्रिशतान्युक्ता मुनीन्द्राः पूर्वधारिणः ॥१४९॥ गतयोऽयुतपूर्वाणि शतानि नव शिक्षकाः । चतुःशत्तोत्तरं प्रोक्ताः सहस्रमवधित्विषः ॥ १५० ॥ सहस्रमन्तिमज्ञानास्तावन्तो विक्रियद्धिंकाः । शतानि सप्तपञ्चाशचतुर्थावगमाश्रिताः ॥ १५ ॥ वादिनः षट्शतान्येव ते सर्वेऽपि समुचिताः । अभ्यर्णीकृतनिर्वाणाः स्युः सहस्राणि षोडश ॥ १५२ ॥ सुलोचनाद्याः षनित्सहस्राण्यायिका विभोः । श्रावका लक्षमेकं तु त्रिगुणाः श्राविकास्ततः ॥ १५३ ॥ देवा२ देव्योऽप्यसङ्ग्याताः सङ्ख्यातास्तियंगङ्गिनः । एवं द्वादशभिर्युक्तो गणैर्धर्मोपदेशनम् ॥ १५४ ॥ कुर्वाणः पञ्चभिर्मासैविरहीकृतसप्ततिः। संवत्सराणां मासं स संहृत्य विहृतिक्रियाम् ॥ १५५ ॥ पटत्रिंशन्मुनिभिः साधं प्रतिमायोगमास्थितः । श्रावणे मासि सप्तम्यां सितपक्षे दिनादिमे ॥ १५६ ॥ भागे विशाखनक्षत्रे ध्यानद्वयसमाश्रयात् । गुणस्थानद्वये स्थित्वा सम्मेदाचलमस्तके ॥ १५७ ॥ तत्कालोचितकार्याणि वर्तयित्वा यथाक्रमम् । निःशेष कर्मनिर्णाशानिवाणे निश्चल स्थितः ॥१५८ ॥ कृतनिर्वाणकल्याणाः सुरेन्द्रास्तं ववन्दिरे । वन्दामहे वयञ्चैनं नन्दितुं सुन्दरैर्गुणैः ॥ १५९ ॥ : सन्तोऽम्भोनिधिसन्निभाः । उदाहरणमेतेषां पाश्वो गण्यः शार्दूलविक्रीडितम् त्वजन्माभिषवोत्सवे सुरगिरौ स्वोच्छ्वासनिःश्वासजैः स्वर्गेशान्भृशमानयस्त्वमनिलैरान्दोललीलां मुहुः। किं कुर्यात्तव तादृशोऽयममरस्त्वत्क्षान्तिलब्धोदयः पाठीनो जलधेरिवेत्यभिनुतः पार्थो जिनः पातु नः ॥१६॥ पार्श्वनाथके चरणोंमें नमस्कार करने लगे। आचार्य कहते हैं कि पापी कमठके जीवका कहाँ तो निष्कारण वैर और कहाँ ऐसी शान्ति ? सच कहा है कि महापुरुषोंके साथ मित्रता तो दूर रही शत्रुता भी वृद्धिका कारण होती है ।। १४५-१४८॥ भगवान् पार्श्वनाथके समवसरणमें स्वयंभूको आदि लेकर दश गणधर थे, तीन सौ पचास मुनिराज पूर्वके ज्ञाताथे, दश हजार नौ सौ शिक्षक थे, एक हजार चार सौ अयधिज्ञानी थे, एक हजार केवलज्ञानी थे, इतने ही विक्रिया ऋद्धिके धारक थे, सात सौ पचास मनःपर्यय ज्ञानी थे, और छह सौ बादी थे। इस प्रकार सब मिलाकर शीघ्र ही मोक्ष जानेवाले सोलह हजार मुनिराज उनके समवसरणमें थे।॥ १४६-१५२ ॥ सुलोचनाको आदि लेकर छत्तीस हजार आर्यिकाएँ थीं, एक लाख श्रावक थे, तीन लाख श्राविकाएँ थीं, असंख्यात देव-देवियाँ थीं और संख्यात तिर्यश्च थे। इस प्रकार बारह सभाओंके साथ धर्मोपदेश करते हुए भगवान्ने पांच माह कम सत्तर वर्ष तक विहार किया। अन्तमें जब उनकी आयुका एक माह शेष रह गया तब वे विहार बन्दकर सम्मेदाचलकी शिखर पर छत्तीस मुनियोंके साथ प्रतिमायोग धारण कर विराजमान हो गये। श्रावणशुक्ला सप्तमीके दिन प्रातःकालके समय विशाखा नक्षत्रमें शुक्लध्यानके तीसरे और चौथे भेदोंका आश्रय लेकर वे अनुक्रमसे तेरहवें तथा चौदहवें गुणस्थानमें स्थित रहे फिर यथाक्रमसे उस समयके योग्य कार्य कर समस्त कर्मोका क्षय हो जानेसे मोक्षमें अविचल विराजमान हो गये। उसी समय इन्द्रोंने आकर उनके निर्वाण कल्याणकका उत्सव कर उनकी वन्दना की। आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि उनके निर्मल गुणोंसे समृद्ध होनेके कारण हम भी इन भगवान् पार्श्वनाथको नमस्कार करते हैं ।। १५३-१५६।। जो समुद्रके समान आदि मध्य और अन्तमें गम्भीर रहते हैं. ऐसे सज्जनोंका यदि कोई उदाहरण हो सकता है तो क्षमावानोंमें गिनती करनेके योग्य भगवान् पार्श्वनाथ ही हो सकते हैं । १६० ।। 'भगवन् ! जन्माभिषेकके समय सुमेरुपर्वत पर अपने उच्छास और निःश्वाससे उत्पन्न वायुके द्वारा आपने इन्द्रोंको . १ गणोशा ल०।२ देवदेव्यो ख०, क० । ३ निर्वाणं न । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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