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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् पराभवं परिप्राप्तो मा भूस्वमपि तादृशः । मा संस्था मां सपत्नीति मद्वचस्त्वं प्रमाणयन् ॥ ३४५ ॥ त्यज सीतागतं मोहमित्यसौ निजगाद तम् । तदुक्तेरुत्तरं वाक्यमभिधातुमशक्नुवन् ॥ ३४६ ॥ समं प्राणैरियं त्याज्येत्यगात्स कुपितः पुरम् । मन्दोदरी परित्यक्तनिजपुत्रीशुगाहिता ॥ ३४७ ॥ सीतां मिथः श्रिताभाविविदादेशभयात् क्षितौ । यां निक्षेपयति स्मेति मया कलहकारणात् ॥ ३४८ ॥ आगतामेव मत्पुत्रीं तां त्वां मे मन्यते मनः । पापेन विधिनाssनीता भद्रे त्वं दुःखकारिणा ॥ ३४९ ॥ अलङ्घयं केनचिचात्र प्रायेण विधिचेष्टितम् । इह जन्मनि किं बन्धुः किं वा त्वं मेऽम्यजन्मनि ॥ ३५० ॥ न जाने त्वां विलोक्याद्य मम स्नेहः प्रवर्द्धते । यदि मज्जननीत्वं त्वं पद्मनेत्रेऽवबुध्यते ॥ ३५१ ॥ त्वां मे भावयितुं वष्टि सपत्नी खचराधिपः । तेन वाले मृतिं वापि याहि मा गास्तदीप्सितम् ॥ ३५२ ॥ स्तनप्रसूतिमित्येवं वदन्ती प्रापदुत्सुका । तस्याः पयोधरद्वन्द्वमभिषेक्तुमिवापतत् ॥ ३५३ ॥ जलं गद्गदकण्ठायाश्चक्षुभ्यां स्नेहसूचनम् । शोकानलपरिम्लानं वक्त्राब्जं चाभवत्तदा ॥ ३५४ ॥ तीक्ष्य जानकी सर्व प्राप्ता स्वामिव मातरम् । जायते स्मार्द्रहृदया वाष्पाचिलविलोचना ॥ ३५५ ॥ तदभिप्रायमाज्ञाय दशाननवधूत्तमा । यदि स्वकार्य संसिद्धिमभिकामयसे भृशम् ॥ ३५६ ॥ कृताञ्जलिरहं याचे गृहाणाहारमम्बिके । सर्वस्य साधनो देहस्तस्याहारः २ सुसाधनम् ॥ ३५७ ॥ वदन्ति निपुणाः क्ष्माजे 3 प्रसवादि कुतोऽसति । स्थिते वपुषि रामस्य स्वामिनस्तव वीक्षणम् ॥ ३५८ ॥ न चेतद्दर्शनं साध्यं वपुषैव महरायः । न चेन्मद्वचनं ग्राह्यं त्वयाहमपि भोजनम् ॥ ३५९ ॥ ३०२ स्वयंप्रभा के लिए अश्रग्रीव विद्याधर, पद्मावतीके कारण राजा मधुसूदन और सुतारामें आसक्त हुआ निर्बुद्धि अशनिघोष पराभवको पा चुका है अतः आप भी उन जैसे मत होओ। ऐसा मत समझिये कि मैं सौतके भयसे ऐसा कह रही हूँ । आप मेरे वचनको प्रमाण मानते हुए सीता सम्बन्धी मोह छोड़ दीजिये । ऐसा मन्दीदरीने रावणसे कहा। रावण उसके वचनोंका उत्तर देने में समर्थ नहीं हो सका अतः यह कहता हुआ कुपित हो नगरमें वापिस चला गया कि अब तो यह प्राणों के साथ ही छोड़ी जा सकेगी ।। ३३६-३४७ ।। इधर जो अपनी छोड़ी हुई पुत्रीके शोकसे युक्त है ऐसी मन्दोदरी सीतासे एकान्त में कहने लगी कि जिस पुत्रीको मैंने निमित्तज्ञानीके आदेश के से पृथिवी में नीचे गड़वा दिया था वही कलह करनेके लिए मेरी पुत्री तू आ गई है ऐसा मेरा मन मानता है । भद्रे ! तू दुःख देने वाले पापी विधाताके द्वारा यहाँ लाई गई है। सो ठीक ही है क्यों कि इस लोक में प्रायः विधाताकी चेष्टाका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता। मालूम नहीं पड़ता कि तू मेरी इस जन्मकी सम्बन्धिनी है अथवा पर जन्मकी सम्बन्धिनी है । न जाने क्यों तुझे देखकर आज मेरा स्नेह बढ़ रहा है । हे कमललोचने ! बहुत कुछ सम्भव है कि मैं तेरी माँ हूँ और तू मेरी पुत्री है, यह तू भी समझ रही है । परन्तु यह विद्याधरोंका राजा तुझे मेरी सौत बनाना चाहता है। इसलिए हे बच्चे ! चाहे मरणको भले ही प्राप्त हो जाना परन्तु इसके मनोरथको प्राप्त न होना, इसकी इच्छानुसार काम नहीं करना । इस प्रकार कहती हुई मन्दोदरी बहुत ही उत्सुक हो गई । उसके स्तनोंसे दूध भरने लगा और उसके स्तनयुगल सीताका अभिषेक करनेके लिए ही मानो नीचे की ओर झुक गये ।। ३४८ - ३५३ ।। उसका कण्ठ गद्गद हो गया, दोनों नेत्रोंसे स्नेहको सूचित करनेवाला जल गिरने लगा और उस समय उसका मुखकमल शोकरूपी अमिसे मलिन हो गया ॥ ३५४ ॥ यह सब देख सीताको ऐसा लगने लगा मानो मैं अपनी माताके पास ही आ गई हूं, उसका हृदय आर्द्र हो गया और नेत्र आँसुओं से भर गये || ३५५ ।। उसका अभिप्राय जानकर रावणकी पट्टरानी मन्दोदरी कहने लगी कि यदि तू अपना कार्य अच्छी तरह सिद्ध करना चाहती है तो माँ ! हाथ जोड़कर याचना करती हूँ, तू आहार ग्रहण कर, क्योंकि सबका साधन शरीर है और शरीरका साधन आहार है ।। ३५६-३५७ ॥ चतुर मनुष्य यही कहते हैं कि यदि वृक्ष नहीं होगा तो फूल आदि कहाँ से आवेंगे ? इसी प्रकार शरीरके रहते ही तुझे तेरे स्वामी रामचन्द्रका दर्शन हो सकेगा ।। ३५८ ॥ यदि उनका दर्शन साध्य न हो तो इस शरीरसे महान् तप ही करना १ बदती स० । २ तथाहारः ल० । ३ वृक्षे । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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