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________________ अष्टषष्टं पर्व ३०१ रामे प्रेम तद्विद्धि जन्मान्तरितसन्निभम् । चिरं परिचितं कस्माद्विस्मराम्यधुनैव तम् ॥ ३३० ॥ इति चेत्संसृतौ जन्तौ केन कस्य न संस्तवः । परिखावारिधिर्दुर्गत्रिकूटाद्रिः खगेश्वराः ॥ ३३.१ ॥ दुर्गपालाः पुरं लङ्का मेघनादादयो भटाः । नायकोऽहं कथं तस्य तव भर्तुः प्रवेशनम् ॥ ३३२ ॥ तस्मादाशामुक्षित्वा मदाशां पूरय प्रिये । अवश्यं भाविकार्येऽस्मिन् किं कालहरणेन ते ॥ ३३३ ॥ हसन्स्याश्च रुदन्त्याश्च तव प्राघूर्णिकोऽस्म्यहम् । मत्कान्तकान्तासन्ताने कान्ते चूलामणिर्भव ॥ ३३४ ॥ न चेदसि विभाग्यत्वादचैव घटदासिका । अतिथिर्वा भव प्रेतनाथावासनिवासिनाम् ॥ ३३५ ॥ इति तां मामिवापुण्यः स्वकत्तुं व्यर्थमब्रवीत् । तदाकर्ण्यापि भूभूता समाहितमनास्तदा ॥ ३३६ ॥ याति धर्म्येव नैर्मल्यमादधानाभवत्स्थिरा । खगेशवक्त्र निर्यातबाग्जालज्वलनावली ॥ ३३७ ॥ सीता धैर्याम्बुधिं प्राप्य सद्यः शान्तिमगाचदा । विक्रमेण यथा पुंसः सर्वसौभाग्यसम्पदा ॥ ३३८ ॥ बीसृष्टिमपि जेतारं मामेषा परिभावुका । किलेति क्रुध्यतः पत्युर्दीप्तक्रोधदवानलम् ॥ ३३९ ॥ सचः सीतालतां दग्धुं जृम्भमाणं मनोरणे । मन्दोदरी हितश्रव्यवचनामृतवारिभिः ॥ ३४० ॥ प्रशमय्य किमस्थाने जनवत्कोपवान् भवेः । विचिन्तय किमेषा ते दण्डयोग्याऽवभासते ॥ ३४१ ॥ मन्दारप्रसवारब्धमालानिक्षेपमर्हति । सतीनां परिभूत्याशु खगामिन्यादिका अध्रुवम् ॥ ३४२ ॥ विद्याविनाशमायान्ति तत्स्याविर्वा विपक्षकः । पुरा स्वयम्प्रभाहेतोरश्वग्रीवः खगाधिपः ॥ ३४३ ॥ पद्मावतीनिमित्तेन प्रसिद्धो मधुसूदनः । समासतः सुतारायां विधीरशनिघोषकः ॥ ३४४ ॥ होती है अतः यहाँ उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती ।। ३२५-३२६ ।। यदि राममें तेरा प्रेम है तो तू उसे अब मरे हुए समान समझ । जो चिरकालसे परिचित है उसे इस समय एकदम कैसे भूल जाऊँ ? यदि यह तेरा कहना है तो इस संसार में किसका किसके साथ परिचय नहीं है ? कदाचित् यह सोचती हो कि राम यहाँ आकर मुझे ले जावेंगे सो यह भी ठीक नहीं हैं क्योंकि समुद्र तो यहाँकी खाई है, त्रिकूटाचल किला है, विद्याधर लोकपाल हैं, लङ्का नगर है, मेघनाद आदि योद्धा हैं और मैं उनका स्वामी हूँ फिर तुम्हारे रामका यहाँ प्रवेश ही कैसे हो सकता है ? ॥ ३३०-३३२ ।। इसलिए हे प्रिये ! रामकी आशा छोड़कर मेरी आशा पूर्ण करो। जो कार्य अवश्य ही पूर्ण होनेवाला है उसमें समय बितानेसे तुझे क्या लाभ है ? ॥ ३३३ ॥ तू चाहे रो और चाहे हँस, मैं तो तेरा पाहुना हो चुका हूँ । हे सुन्दरी ! तू मेरी सुन्दर स्त्रियोंके समूहमें चूडामणिके समान हो ॥ ३३४ ॥ यदि तू अभाग्यवश मेरा कहना नहीं मानेगी तो तुझे आज ही मेरी घटदासी बनना पड़ेगा अथवा यमराजके घर रहनेवालोंका अतिथि होना पड़ेगा ।। ३३५ ।। इस तरह जिस प्रकार पुण्यहीन मनुष्य लक्ष्मीको वश करनेके लिए व्यर्थ ही बकवास करता है उसी प्रकार उस रावणने सीताको वश करनेके लिए व्यर्थ ही बकवास किया । उसे सुनकर सीता निश्चल चित्त हो धर्म्यध्यानके समान निर्मलता धारण करती हुई निश्चल बैठी रही । रावणके मुखसे निकले हुए वचन-समूहरूपी श्रमिकी पंक्ति सीताके धैर्यरूपी समुद्रको पाकर शीघ्र ही उसी समय शान्त हो गई। उस समय रावण सोचने लगा कि 'मैं जिस प्रकार पराक्रमके द्वारा समस्त पुरुषोंको जीतता हूँ उसी प्रकार अपनी सौभाग्यरूपी सम्पदाके द्वारा समस्त स्त्रियोंको भी जीतता हूं - उन्हें अपने वश कर लेता हूं फिर भी यह सीता मेरा तिरस्कार कर रही है' ऐसा विचारकर रावण क्रोध करने लगा । सीतारूपी लताको शीघ्र ही जलाने के लिए रावणके मनरूपी युद्धस्थलमें जो प्रचण्ड क्रोधरूपी दावानल फैल रही थी उसे मन्दोदरीने हितकारी तथा सुननेके योग्य वचनरूपी अमृत जलसे शान्तकर कहा कि आप इसतरह साधारण पुरुषके समान अस्थानमें क्यों क्रोध करते हैं ? जरा सोचो तो सही, यह स्त्री क्या आपके दण्ड देने योग्य मालूम होती है ? अरे, मन्दारवृक्ष के फूलोंसे बनी हुई माला क्या अभिमें डाली जानेके योग्य है ? आप यह याद रखिये कि सती स्त्रियोंका तिरस्कार करनेसे श्राकाशगामिनी आदि विद्याएँ निश्चित ही नष्ट हो जाती हैं और ऐसा होनेसे आप पक्षरहित पक्षीके समान हो जायेंगे। पहले १ मामिव लक्ष्मीमिष । २ सीता । ३ खगामित्यादिका म० । ४ विः पक्षी । ५ बिपतकः पच्चरहितः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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