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________________ सतषष्टितमं पर्व २७७ इच्याख्याताः पुराणशैर्मुनीशैः प्राग्मया श्रुताः । 'तेष्वष्टमाविमौ रामकेशवौ नः कुमारको ॥ ४६९ ॥ भाविनी रावणं हत्वेत्यवादीद्धाविविद्रिः । तत्रादुक्त तदाकर्ण्य परितोषमगानपः ॥ ४७० ॥ शार्दूलविक्रीडितम् कृत्वा पापमदः क्रुधां पशुवधस्योत्सूत्रमाभूतलं, हिंसायज्ञमवर्तयत् कपटधीः करो महाकालकः । तेनागात्सवसुः सपर्वतखलो घोर धरी नारकी दुर्मान् दुरितावहान्विदधतां नैतन्महत्पापिनाम् ॥ ४७१॥ व्यामोहात्सुलसाप्रियस्ससुलसः सार्द्ध स्वयं मन्त्रिणा शत्रुच्छद्मविवेकशून्यहृदयः सम्पाद्य हिंसाक्रियाम् । नष्टो गन्तुमधः क्षितिं दुरितिनामकरनाशं मुधा दुःकर्माभिरतस्य किं हि न भवेदन्यस्य चेहविधम् ॥४७२॥ वसन्ततिलकावृत्तम् स्वाचार्यवर्यमनुसृत्य हितानुशासी वादे समेत्य बुधसंसदि साधुवादम् । श्रीनारदो विहितभूरितपाः कृतार्थः सर्वार्थसिद्धिमगमत्सुधियामधीशः ॥ ४७३ ॥ इत्याचे भगवद्णभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे दुर्मार्गप्रवर्तनप्रपञ्चव्यावर्णन नाम सप्तषष्टं पर्व ॥१७॥ तीन प्रकारके चक्रवर्ती (चक्रवर्ती, नारायण और प्रतिनारायण) और महा प्रतापी बलभद्र होते हैं ऐसा पुराणोंके जाननेवाले मुनियोंने कहा है तथा मैंने भी पहले सुना है । हमारे ये दोनों कुमार उन महापुरुषोंमें आठवें बलभद्र और नारायण होंगे ॥४६८-४६६ ॥ तथा रावणको मारेंगे। इस प्रकार भविष्यको जाननेवाले पुरोहितके वचन सुनकर राजा सन्तोषको प्राप्त हुए ॥ ४७० ॥ कपट रूप बुद्धिको धारण करनेवाले क्रूरपरिणामी महाकालने क्रोधवश समस्त संसारमें शास्त्रोंके विरुद्ध और अत्यन्त पाप रूप पशुओंकी हिंसासे भरे हिंसामय यज्ञकी प्रवृत्ति चलाई इसी कारणसे वह राजा वसु, दुष्ट पर्वतके साथ घोर नरकमें गया सो ठीक ही है क्योंकि जो पाप उत्पन्न करनेवाले मिथ्यामार्ग चलाते हैं उन पापियोंके लिए नरक जाना कोई बड़ी बात नहीं है॥४७१ ॥ मोहनीय कर्मके उदयसे जिसका हृदय शत्रुओंका छल समझनेवाले विवेकसे शून्य था ऐसाराजा सगर रानी सुलसा और वि मन्त्रीके साथ स्वयं हिंसामय क्रियाएँ कर अधोगतिमें जानेके लिए नष्ट हुआ सो जब राजाकी यह दशा हुई तब जो अन्य साधारण मनुष्य अपने क्रूर परिणामोंको नष्ट न कर व्यर्थ ही दुष्कर्ममें तल्लीन रहते हैं उनकी क्या ऐसी दशा नहीं होगी ? अवश्य होगी ।। ४७२ ।। जिसने अपने श्रेष्ठ आचार्य अनुसरण कर हितका उपदेश दिया, विद्वानोंकी सभामें शास्त्रार्थ कर जिसने साधुवाद-उत्तम प्रशंसा प्राप्त की, जिसने बहुत भारी तप किया और जो विद्वानोंमें श्रेष्ठ था ऐसा श्रीमान् नारद कृतकृत्य होकर सर्वार्थसिद्धि गया ॥ ४७३ ।। इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीत, त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रहमें मिथ्या मार्गकी प्रवृत्तिके विस्तारका वर्णन करनेवाला सड़सठवाँ पर्व समाप्त हुआ। गुरुका अनुसरण कर १ भुतेष्व-स। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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