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________________ अष्टपष्टं पर्व पुराहितः पुनावाणिर्भवावलीम् । भगुणैर्युक्तो देशः पुराहितः पुनश्चासौ तत्कथां श्रोतुमर्हसि । इति सम्बोध्य भूपालं ततो वक्तुं प्रचक्रमे ॥१॥ क्रमेण श्रव्यशब्दार्थसारवाणिर्भवावलीम् । दशास्यस्य दशाशास्यप्रकाशिस्वयशःश्रियः ॥ २॥ अथास्ति नाकलोकाभो धातकीखण्डपूर्वभाग । भारते भूगुणैर्युको देशः सारसमुच्चयः ॥ ३ ॥ तस्मिन्नागपुरे ख्यातो नरदेवो महीपतिः । स कदाचिदनन्ताख्यगणेशात्कृतवन्दनः ॥ ४ ॥ श्रुतधर्मकथो जातनिर्वेदो ज्येष्ठसूनवे । प्रदाय भोगदेवाय राज्यमापनसंयमः ॥ ५॥ चरंस्तपः समुत्कृष्टं रष्ट्वा विद्याधराधिपम् । सद्यश्चपलवेगाख्यं निदानमकरोदधीः ॥ ६॥ प्रान्ते संन्यस्य सौधर्मकल्पेऽभूदमृताशनः । अथास्मिन्भारते क्षेत्रे विजयाईमहाचले ॥ ७ ॥ खगेशो दक्षिणश्रेण्यां मेघकूटपुराधिपः । विनम्यन्वयसम्भूतः सहस्रग्रीवखेचरः ॥ ८॥ ऋधात्मभातृपुत्रोरुबलेनोत्सादितस्ततः । गत्वा लङ्कापुरं' त्रिंशत्सहस्राब्दान्यपालयत् ॥९॥ तस्य पुत्रः शतग्रीवस्तत्षडंशोनवत्सरान् । पाति स्म तत्सुतः पञ्चाशग्रीवोप्यन्वपालयत् ॥१०॥ वत्सराणां सहस्राणि विंशतिं तस्य चात्मजः । पुलस्त्यस्त्रिकमेर्वेकवर्षायुस्तस्य वल्लभा ॥११॥ मेघश्रीरनयोः सूनुः स देवोऽभूद्दशाननः । चतुर्दशसहस्राब्दपरमायुर्महीतलम् ॥१२॥ पालयअन्यदा कान्तासहायः क्रीडितुं वनम् । गत्वा लकेश्वरः खेचराचलस्थालकेशितुः ॥१३॥ तदनन्तर जिसके शब्द और अर्थ सुनने योग्य हैं तथा वाणी सारपूर्ण है ऐसा पुरोहित, 'महाराज आप यह कथा श्रवण करनेके योग्य हैं। इस प्रकार महाराज दशरथको सम्बोधित कर अपने यशरूपी लक्ष्मीसे दशों दिशाओंके मुखको प्रकाशित करनेवाले रावणके भवान्तर कहने लगा॥१-२॥ उसने कहा कि धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व भरतक्षेत्रमें स्वर्गलोकके समान आभावाला एवं पृथिवीके गुणोंसे युक्त सारसमुच्चय नामका देश है ॥ ३॥ उसके नागपुर नगरमें नरदेव नामका राजा राज्य करता था। वह किसी एक दिन अनन्त नामक गणधरके पास गया, उन्हें वन्दना कर उसने उनसे धर्म-कथा सुनी और विरक्त होकर भोगदेव नामक बड़े पुत्रके लिए राज्य दे दिया तथा संयम, धारण कर उत्कृष्ट तपश्चरण किया । तपश्चरण करते समय उस मूर्खने कदाचित् चपलवेग नामक विद्याधरोंके राजाको देखकर शीघ्र ही निदान कर लिया। जब आयुका अन्त आया तब संन्यास धारण कर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ। अथानन्तर-इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें जो विजयार्ध नामका महान् पर्वत है उसकी दक्षिण श्रेणी में मेघकूट नामका नगर है। उसमें राजा विनमिके वंशमें उत्पन्न हुआ सहस्रग्रीव नामका विद्याधर राज्य करता था। उसके भाईका पुत्र बहुत बलवान् था इसलिए उसने क्रोधित होकर सहस्नग्रीषको बाहर निकाल दिया था। वह सहस्रग्रीव वहाँ से निकल कर लङ्का नगरी गया और वहाँ तीस हजार वर्ष तक राज्य करता रहा ॥४-६ ।। उसके पुत्रका नाम शतग्रीव था। सहस्रग्रीवके बाद उसने वहाँ पच्चीस हजार वर्ष तक राज्य किया था। उसका पुत्र पश्चाशतग्रीव था उसने भी शतग्रीवके बाद बीस हजार वर्ष तक पृथिवीका पालन किया था, तदनन्तर पश्चाशदुग्रीवके पुलस्त्य नामका पुत्र हुआ उसने भी पिताके बाद पन्द्रह हजार वर्ष तक राज्य किया। उसकी स्त्रीका नाम मेघश्री था। उन दोनोंके वह देव रावण नामका पुत्र हुआ। चौदह हजार वर्षकी उसकी उत्कृष्ट आयु थी, पिताके बाद वह भी पृथिवीका पालन करने लगा। एक दिन लङ्काका ईश्वर रावण अपनी स्त्रीके साथ क्रीड़ा करनेके १-महंति क., ल०। २ भवावलिम् ल०। ३ अथास्मिन् क०, ख, ग, घ०। ४ नाकपुरे ल०, ग०। ५ लङ्कापुरीम् क०, घ०। ६ त्रिखमेवेंक (१५०००) क०, ख०, ग०, प०, म०। त्रिखबेकस.(१)। खेचराचलकेशितःला Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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