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________________ सप्तषष्टितम पर्व तथापि वशमेवाज्ञः सन्मार्ग प्रतिपादयन् । भुवा कुपित एवासौ निगीर्णोऽन्त्यामगाक्षितिम् ॥४३९ ॥ अथासुरो जगत्प्रत्ययायादाय नरेन्द्रयोः । दिव्यं रूपमवापावावां यागश्रद्धया दिवम् ॥ ४४.॥ नारदोक्तमपाकर्ण्यमित्युक्त्वापददृश्यताम् । शोकाश्चर्यवतागात्स्वर्वसुर्नहि महीमिति ॥ ४४१ ॥ संविसंवदमानेन जनेन महता सह । प्रयागे विश्वभूर्गत्वा राजसूयविधि व्यधात् ॥ ४५२ ॥ महापुराधिपाद्याश्च निन्दन्तो जनमूढताम् । परमब्रह्मनिर्दिष्टमार्गरक्ता मनाक् स्थिताः ॥ ४४३ ॥ नारदेनैव धर्मस्य मर्यादेत्यभिनन्य तम् । अधिष्ठानमदुस्तस्मै पुरं गिरितटाभिधम् ॥ ४४४ ॥ तापसाच दयाधर्मविध्वंसविधुराशयाः। कलयन्तः कलिं कालं विचेलुः स्वं स्वमाश्रमम् ॥ ४४५ ॥ ततोऽन्येयुः खगो नाना देवो दिनकरादिमः । पर्वतस्याखिलप्राणिविरुद्धाचरितं त्वया ॥ ४४६ ॥ निरुध्यतामिति प्रीत्या निर्दिष्टो नारदेन सः। करिष्यामि तथेतीत्वा नागान्' गंधारपञ्चगान् ॥ ४४७ ॥ स विद्यया समाहूतांस्तत्प्रपञ्च यथास्थितम् । अवोचत्तेऽपि संग्रामे भक्त्वा दैत्यमकुर्वत ॥ ४४८॥ यशविनं समालोक्य विश्वभूपर्वताहयौ । शरणान्वेषणोयुको महाकालं यहच्छया ॥ ४४९ ॥ पुरः सन्निहितं रष्वा यागवितं तमूचतुः। बागैङ्केषिभिरस्माकं विहितोऽयमुपद्रवः ॥ ४५० ॥ नागविद्याश्च विद्यानुप्रवादे परिभाषिताः। निषिद्धं जिनविम्बानामुपासां विजम्भणम् ॥ १५॥ ततो युवां जिनाकारान् सुरूपान् दिक्चतुष्टये । निवेश्याभ्यय॑ यज्ञस्य प्रक्रमेथामिमं विधिम् ॥ १५२॥ इत्युपायमसावाह तौ च तच्चक्रतुस्तथा । पुनः खगाधिपोऽभ्येत्य यज्ञविन्नविधित्सया ॥ ४५३ ॥ को ही सन्मार्ग बतलाता रहा। अन्तमें पृथिवीने उसे कुपित होकर ही मानो निगल लिया और वह मरकर सातवें नरक गया ॥४३५-४३६।। तदनन्तर वह असुर जगत्को विश्वास दिलानेके लिए राजा सगर और वसुका सुन्दर रूप धारण कर कहने लगा कि हम दोनों नारदका कहा न सुनकर यज्ञकी श्रद्धासे ही स्वर्गको प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार कहकर वह अदृश्य हो गया। इस घटनासे लोगोंको बहुत शोक और आश्चर्य हुआ। उनमें कोई कहता था कि राजा सगर स्वर्ग गया है और कोई कहता था कि नहीं, नरक गया है। इस तरह विवाद करते हुए विश्वम्भू मन्त्री अपने घर चला गया। तदनन्दर प्रयागमें उसने राजसूय यज्ञ किया। इसपर महापुर आदि नगरोंके राजा मनुष्योंकी मूढ़ताकी निन्दा करने लगे और परम ब्रह्म-परमात्माके द्वारा बतलाये मार्गमें तल्लीन होते हुए थोड़े दिन तक यों ही ठहरे रहे ॥४४०-४४३ ।। इस समय नारदके द्वारा ही धर्म की मर्यादा स्थिर रह सकी है इसलिए सब लोगोंने उसकी बहुत प्रशंसा की और उसके लिए गिरितट नामका नगर प्रदान किया ॥४४४॥ तापसी लोग भी दया धर्म का विध्वंस देख बहुत दुखी हुए और कलिकालकी महिमा समझते हुए अपने-अपने आश्रमोंमें चले गये ॥४४५॥ तदनन्तर किसी दिन, दिनकरदेव नामका विद्याधर आया, नारदने उससे बड़े प्रेमसे कहा कि इस समय पर्वत समस्त प्राणियोंके विरुद्ध आचरण कर रहा है इसे आपको रोकना चाहिये। उत्तरमें विद्याधरने कहा कि अवश्य रोकूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी विद्यासे गंधारपन्नग नामक नागकुमार देवोंको बुलाया और विघ्न करनेका सब प्रपञ्च उन्हें यथा योग्य बतला दिया। नागकुमार देवोंने भी संग्राममें दैत्योंको मार भगाया और यज्ञमें विघ्न मचा दिया। विश्वम्भू मन्त्री और पर्वत यज्ञमें होनेवाला विघ्न देखकर शरणकी खोज करने लगे। अनायास ही उन्हें सामने खड़ा हुआ महाकाल असुर दिख पड़ा। दिखते ही उन्होंने उससे यज्ञमें विघ्न आनेका सब समाचार कह सुनाया, उसे सुनते ही महाकालने कहा कि हम लोगोंके साथ द्वेष रखनेवाले नागकुमार देवोंने यह उपद्रव किया है । नागविद्याओंका निरूपण विद्यानुवादमें हुआ है। जिनविम्बोंके ऊपर इनके विस्तारका निषेध बतलाया है अर्थात् जहाँ जिनविम्ब होते हैं वहाँ इनकी शक्ति क्षीण हो जाती है ॥४४६-४५१ ।। इसलिए तुम दोनों चारों दिशाओंमें जिनेन्द्रके आकारकी सुन्दर प्रतिमाएँ रखकर उनकी पूजा करो और तदनन्तर यज्ञकी विधि प्रारम्भ करो.॥ ४५२॥ इस प्रकार महाकालने यह उपाय कहा और उन १ नागा तं धार ल.(१)। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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