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________________ त्रिषष्टितमं पर्व सिंहासने समासीनो वीज्यमानप्रकीर्णकः । अर्द्धचक्री व्यराजिष्ट यथा षटखण्डमण्डितः॥१॥ अथापराजितोप्यात्मयोग्यरत्नाद्यधीश्वरः । बलदेवपदं प्राप्य प्रत्यहं वृद्धिमातनोत् ॥ २॥ एवं भवान्तराबद्धविवृद्धस्नेहयोस्तयोः । काले गच्छत्यविच्छिन्नस्वच्छन्दसुखसारयोः ॥ ३ ॥ विजयायां हलेशस्य बभूव सुमतिः सुता । ज्योत्स्नेव प्रीणिताशेषा शुक्लपक्षेन्दुरेखयोः ॥ ४ ॥ सान्वहं कुर्वती वृद्धि स्वस्याः पित्रोरपि स्वयम् । गुणैराह्लादनैः प्रीतिं व्यधात्कुवलयेप्सिताम् ॥ ५ ॥ दानाबमवराख्याय चारणाय यथोचितम् । साश्चर्यपञ्चकं प्राप तत्र दृष्टा निजात्मजाम् ॥ ६ ॥ रूपेण केवलेनेयं भूषिता यौवनेन च । वरं प्रार्थयते बाला संश्रिता कालदेवताम् ॥ ७ ॥ इति सञ्चिन्त्य तौ श्रावितस्वयंवरघोषणौ । कृत्वा स्वयंवृतेः शाला प्रवेश्यात्र वरोत्तमान् ॥ ८ ॥ सुतां च स्यन्दनारूढां सुप्रीतौ तस्थतुस्तदा । काचिद्विमानमारुह्य खागता सुरसुन्दरी ॥ ९॥ अभिजानासि किं देवलोकेऽहं त्वं च कन्यके। 'वत्स्यावस्तत्र संज्ञानात्समभूत् स्थितिरावयोः ॥१०॥ या प्रागवतरद्धात्री तामन्या बोधयत्विति । अवे नौ भवसम्बन्ध सन्निधाय मनः शृणु ॥ ११ ॥ पुष्करद्वीपपूर्वार्द्धभरते नन्दने पुरे । नयविक्रमसम्पनो महीशोऽमितविक्रमः ॥ १२॥ -ऐतस्यानन्दमत्याध धनानन्तश्रियौ सुते । भूत्वा वां सिद्धकूटस्थनन्दनाख्ययतीश्वरात् ॥ १३ ॥ जिसपर चमर दुर रहे हैं ऐसा सिंहासनपर बैठा हुआ अर्द्धचक्री-नारायण अनन्तवीर्य इस प्रकार सुशोभित हो रहा था मानो छह खण्डोंसे सुशोभित पूर्ण चक्रवर्ती ही हो ॥१॥ इसी प्रकार अपराजित भी अपने योग्य रत्न आदिका स्वामी हुआ था और बलभद्रका पद प्राप्तकर प्रतिदिन वृ प्राप्त होता रहता था ॥२॥ जिनका स्नेह दूसरे भवोंसे सम्बद्ध होनेके कारण निरन्तर बढ़ता रहता है और जो स्वच्छन्द रीतिसे अखण्ड श्रेष्ठ सुखका अनुभव करते हैं ऐसे उन दोनों भाइयोंका काल क्रमसे व्यतीत हो रहा था ॥३॥ कि बलभद्रकी विजया रानीसे सुमति नामकी पुत्री उत्पन्न हुई। वह शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी रेखाओंसे उत्पन्न चांदनीके समान सबको प्रसन्न करती थी।॥४॥ वह कन्या प्रतिदिन अपनी वृद्धि करती थी और आह्लादकारी गुणोंके द्वारा माता-पिताके भी कुवलयेप्सित-पृथिवीमण्डलमें इष्ट अथवा कुमुदोंको इष्ट प्रेमको बढ़ाती थी॥ ५॥ किसी एक दिन राजा अपराजितने दमवरनामक चारणऋद्धिधारी मुनिको आहार दान दे कर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये। उसी समय उन्होंने अपनी पुत्रीको देखा और विचार किया कि अब यह न केवल रूपसे ही विभूषित है किन्तु यौवनसे भी विभूषित हो गई है। इस समय यह कन्या कालदेवताका आश्रय पाकर वरकी प्रार्थना कर रही है अर्थात् विवाहके योग्य हो गई है ।। ६-७ ॥ ऐसा विचार कर उन दोनों भाइयोंने स्वयंवरकी घोषणा सबको सुनवाई और स्वयंवरशाला बनवा कर उसमें अच्छेअच्छे मनुष्योंका प्रवेश कराया ॥८॥ पुत्रीको रथपर बैठा कर स्वयंवरशालामें भेजा और आप दोनों भाई भी वहीं बैठ गये। कुछ समय बाद एक देवी विमानमें बैठ कर आकाशमार्गसे आई और सुमति कन्यासे कहने लगी॥६॥ क्यों याद है हम दोनों कन्याएं स्वर्गमें रहा करती थीं। उस समय हम दोनोंके बीच यह प्रतिज्ञा हुई थी कि जो पृथिवीपर पहले अवतार लेगी उसे दूसरी कन्या समझावेगी । मैं दोनों के भवोंका सम्बन्ध कहती हूं सो तुम चित्त स्थिर कर सुनो । १०-११ ।। पुष्कर द्वीप सम्बन्धी भरतक्षेत्रके नन्दनपुर नामक नगरमें वय और पराक्रमसे सुशोभित एक अमितविक्रम नामका राजा राज्य करता था। उसकी आनन्दमती नामकी रानीसे हम दोनों धनश्री १ वीज्यमानः प्रकीर्णकैः ख०, ग०, म० । २ खगता ख०, ग० ।-मारुह्य गता ल० । ३ वस्यावः ल । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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