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________________ द्विषष्टितम पर्व १७३ श्रत्वैतदतिशोकार्ता वन्दित्वा निनपुङ्गवम् । प्रभाकरीमगात्ताभ्यां सह सा खेचरात्मजा ॥ ५०२॥ सुघोपविद्युईष्ट्राख्यौ प्रातरौ कनकश्रियः । तत्पुरेऽनन्तसेनेन युध्यमानौ बलोद्धतौ ॥ ५०३ ॥ विलोक्य विहितक्रोधी बनतुर्बलकेशवौ। तनिशम्य खगाधीशतनूजा सोढुमक्षमा ॥ ५०४ ॥ प्रवृद्धतेजसा युना भानुनेव हतयुतिः। 'युताऽसाविन्दुरेखेव क्षीणा पक्षबलाद्विना ॥ ५०५ ॥ शोकदावानलम्लाना दूनेव बनवल्लरी। व्युच्छिन्नकामभोगेच्छा चिच्छित्सुर्दुःखसन्ततिम् ॥ ५०६ ॥ मोचयित्वानुबुध्यैतौ सम्प्रार्थ्य बलकेशवौ। स्वयम्प्रभाख्यतीर्थेशात्पीतधर्मरसायना ॥ ५०७॥ सुप्रभागणिनीपाखें दीक्षित्वा जीवितावधौ। सौधर्मकल्पे देवोऽभूचित्रं विलसितं विधेः ।। ५०८ ।। हरिणी सुविहितमहोपायौ वियाबलाबहुपुण्यको बुधजननुतौ सुप्रारम्भौ परस्परसङ्गतौ ॥ हतपृथुरिपुशान्तात्मनौ यथानयविक्रमौ सममविशतां सिद्धार्थौ तौ पुरी परमोत्सवाम् ॥ ५०९ ॥ वसन्ततिलका जित्वा प्रसिद्धखचरान् खचराधिभर्तु रध्यास्य तद्वलधरत्वमलक्ष्यशक्तिः। व्यक्तीचकार सुचिरादपराजितत्वं भावेन चैतदिति नैव निजेन नाम्ना ॥ ५१०॥ चक्रण तस्य युधि तं दमितारिशक्ति । हत्वा त्रिखण्डपतितां समवाप्य तस्मात् । साधुओंमें घृणा नहीं करते हैं । ४६८-५०१॥ - यह सुनकर विद्याधरकी पुत्री शोकसे बहुत ही पीड़ित हुई। अनन्तर जिनेन्द्रदेवकी वन्दना कर नारायण और बलभद्रके साथ प्रभाकरीपुरीको चली गई । इधर सुघोष और विद्युइंष्ट्र कनकश्रीके भाई थे। वे बलसे उद्धत थे और शिवमन्दिरनगरमें ही नारायण तथा बलभद्र के द्वारा भेजे हुए अनन्तसेनके साथ युद्ध कर रहे थे। यह देख कर बलभद्र तथा नारायणको बहुत क्रोध आया, उन्होंने उन दोनोंको बाँध लिया। यह सुनकर कनकभी उनके दुःखको सहन नहीं कर सकी और जिस प्रकार बढ़ते हुए तेजवाले तरुण सूर्यसे युक्त चन्द्रमाकी रेखा कान्तिहीन तथा क्षीण हो जाती है उसी प्रकार वह भी पक्षबलके बिना कान्तिहीन तथा क्षीण हो गई ॥ ५०२-५०५ ॥ शोकरूपी दावानलसे मुरझाकर वह वनलताके समान दुःखी हो गई। उसने काम-भोगकी सब इच्छा छोड़ दी, वह केवल भाइयों का दुःख दूर करना चाहती थी। उसने दोनों भाइयोंको समझाया तथा बलभद्र और नारायणको प्रार्थना कर उन्हें बन्धनसे छुड़वाया। स्वयंप्रभनामक तीर्थकरसे धर्म रूपी रसायन का पान किया और सुप्रभ नामकी गणिनीके समीप दीक्षा धारण कर ली। अन्तमें आयु समाप्त होने पर सौधर्मस्वर्गमें देव पद प्राप्त किया सो ठीक ही है क्योंकि कर्मका उदय बड़ा विचित्र है ॥५०६-५०८ ॥ जिन्होंने विद्याके बलसे बड़े-बड़े उपाय किये हैं, जो बहुत पुण्यवान् हैं, विद्वान लोग जिनकी स्तुति करते हैं, जो अच्छे कार्य ही प्रारम्भ करते हैं, परस्पर मिले रहते हैं. बड़े-बड़े शत्रुओंको मारकर जिनकी आत्माएं शान्त हैं और नीतिके अनुसार ही जो पराक्रम दिखाते हैं ऐसे उन दोनों भाइयोंने कृतकृत्य हो कर बहुत भारी उत्सवोंसे युक्त नगरीमें एक साथ ॥५०॥अलंघ्य शान्तिको धारण करने वाले अपराजितने प्रसिद्ध-प्रसिद्ध विद्याधरोंको जीत कर विद्याधरोंके स्वामीका पद तथा बलभद्रका पद प्राप्त किया और इस तरह केवल नामसे ही नहीं किन्तु भावसे भी अपना अपराजित नाम चिरकाल तक प्रकट किया ।। ५१० ॥ शत्रुओंकी शक्ति १ श्रुत्वा तदति ल० । २ सुतासाविन्दु-ख०, क० । प्लुतासा-ग०।युक्तासा-म० । ३ समवाप ख०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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