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________________ द्विषष्टितमं पर्व तद्दर्शनसमुद्भूतमदनज्वरविह्वलाम् । नर्तक्यौ तां समादाय जग्मतुर्मरुतः पथा ॥ ४७३ ॥ तद्वात खेचराधीशः श्रुत्वाऽन्तर्वंशिकोदितात् । स्वभटान्प्रेषयामास तद्वयानयनं प्रति ॥ ४७४ ॥ तदागमनमालोक्य स निवर्त्य हली बली । न्ययुध्यतानुजं दूरे स्थापयित्वा सकन्यकम् ॥ ४७५ ॥ ते तेन सुचिरं युद्ध्वा कृतान्तोपान्तमाश्रिताः । दमितारिः पुनः क्रुद्ध्वा युद्धशौण्डान् समादिशत् ॥ ४७६ ॥ तेऽपि तत्खङ्गधारोरुवारिराशाविवाद्रयः । निमज्जन्ति स्म तच्छ्रुत्वा खगाधीशः सविस्मयः ॥ ४७७ ॥ नर्तक्योर्न प्रभावोऽयं किमेतद् ब्रूत मन्त्रिणः । इत्याह ते च तत्तत्वं स्वयं ज्ञात्वा न्यवेदयन् ॥ ४७८ ॥ तदा लब्धेन्धनो वाग्भिः क्रुद्धो वा गजविद्विषः । दमितारिः स्वयं योद्धुं चचाल स्वबलान्वितः ॥ ४७९ ॥ एककोऽपि हली सर्वान् विद्याविक्रमसाधनः । दमितारिं विमुच्यैतान् देहशेषांश्चकार सः ॥ ४८० ॥ दमितारिं यमं वैकं हन्तुमायान्तमग्रजम् । अनन्तवीर्यस्तं दृष्ट्वा केसरीव मदद्विपम् ॥ ४८१ ॥ अभ्येत्यानेकधा युद्ध्वा विद्याबलमदोद्धतम् । विमदीकृत्य निस्पन्दं व्यधादधिकचिक्रमः ॥ ४८२ ॥ खगेशश्चक्रमादाय क्षिपति स्माभिभूभुजम् । दक्षिणाप्रकराभ्यर्णे तस्थिवत्तत्परीत्य तम् ॥ ४८३ ॥ मृत्युं वा धर्मचक्रेण योगी तं खेचराधिपम् । अहँस्तेनैव चक्रेण विक्रमी भाविकेशवः ॥ इति युद्धान्तमासाद्य गगने गच्छतोस्तयोः । पूज्यातिक्रमभीत्येव विमाने सहसा स्थिते ॥ केनचित् कीलितो वेतो न यातः केन हेतुना । इति तौ परितो वीक्ष्य सदो दिव्यं व्यलोक्यत ॥ ४८६ ॥ Jain Education International १७१ ४८४ ॥ ४८५ ॥ कहकर उन्होंने अनन्तवीर्यका साक्षात् रूप दिखा दिया ।। ४७९-४७२ ।। उसे देखकर कनकश्री कारसे विह्वल हो गई और उसे लेकर वे दोनों नृत्यकारिणी आकाशमार्गसे चली गई ।। ४७३ ।। विद्याधरोंके स्वामी दमितारिने यह बात अन्तःपुरके अधिकारियोंके कहनेले सुनी और उन दोनोंको वापिस लाने के लिए अपने योद्धा भेजे ।। ४७४ ।। बलवान् बलभद्रने योद्धाओं का आगमन देख, कन्या सहित छोटे भाईको दूर रक्खा और स्वयं लौटकर युद्ध किया ।। ४७५ ।। जब बलभद्रने चिरकाल तक युद्ध कर उन योद्धाओंको यमराजके पास भेज दिया तब दमितारिने कुपित होकर युद्ध करनेमें समर्थ दूसरे योद्धाओंको आज्ञा दी ।। ४७६ ।। वे योद्धा भी, जिस प्रकार समुद्र में पहाड़ दूब जाते हैं उसी प्रकार बलभद्रकी खड्गधाराके विशाल पानीमें डूब गये । यह सुनकर दमितारिको बड़ो आश्चर्य हुआ ।। ४७७ ।। उसने मन्त्रियोंको बुलाकर कहा कि 'यह प्रभाव नृत्यकारिणियोंका नहीं हो सकता, ठीक बात क्या है ? आप लोग कहें ? मन्त्रियोंने सब बात ठीक-ठीक जानकर राजासे कहीं ।। ४७८ ।। उस समय जिस प्रकार इन्धन पाकर अभि प्रज्वलित हो उठती है, अथवा सिंहका क्रोध भड़क उठता है उसी प्रकार राजा दमितारि भी कुपित हो स्वयं युद्ध करनेके लिए अपनी सेना साथ लेकर चला ।। ४७६ ।। परन्तु विद्या और पराक्रमसे युक्त एक बलभद्रने ही उन सबको मार गिराया सिर्फ दमितारिको ही बाकी छोड़ा ॥ ४८० ।। इधर जिस प्रकार मदोन्मत्त हाथीके ऊपर सिंह आ टूटता है उसी प्रकार बड़े भाईको मारनेके लिए श्राते हुए यमराजके समान दमितारिको देखकर अनन्तवीर्य उस पर टूट पड़ा ।। ४८१ ।। अधिक पराक्रमी अनन्तवीर्यने उसके साथ अनेक प्रकारका युद्ध किया, तथा विद्या और बलके मदसे उद्धत उस दमितारिको मद रहित कर निश्चेष्ट बना दिया था ॥ ४८२ ॥ अबकी बार विद्याधरोंके राजा दमितारिने चक्र लेकर राजा अनन्तवीर्यके सामने फेंका परन्तु वह चक्र उनकी प्रदक्षिणा देकर उनके दाहिने कन्धेके समीप ठहर गया ।। ४८३ ।। जिस प्रकार योगिराज धर्मचक्र के द्वारा मृत्युको नष्ट करते हैं उसी प्रकार पराक्रमी भावी नारायणने उसी चक्रके द्वारा दमितारिको नष्ट कर दिया - मार डाला ।। ४८४ ॥ इस तरह युद्ध समाप्त कर दोनों भाई आकाशमें जा रहे थे कि पूज्य पुरुषोंका कहीं उल्लंघन न हो जावे इस भयसे ही मानो उनका विमान सहसा रुक गया ॥ ४८५ ॥ यह विमान किसीने कील दिया है अथवा किसी अन्य कारणसे आगे नहीं जा रहा है ऐसा सोचकर वे दोनों भाई चारों ओर देखने लगे। देखते ही उन्हें समवसरण १ खचराधिपम् त० । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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