SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 198
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १७० महापुराणे उत्तरपुराणम् यामेति 'दूतेनालप्य सम्प्राप्य शिवमन्दिरम् । समालोचितगूढाथों प्रविश्य नृपमन्दिरम् ॥४६२॥ दृष्टवन्तौ खगाधीशं 'यथौचित्यं प्रतुष्य सः । सम्भाष्य सामवाक्सारः पूजयित्वा दिने परे ॥४६३॥ अङ्गहारः सकरणैः रसै वर्मनोहरैः। नृत्यं तयोविलोक्याप्तसम्मदः परितोपितः ॥ ४६४ ॥ भवन्नृत्यकलां 3कल्यां वासु४ शिक्षयतां सुताम् । मदीयामित्यदात्कन्यामेताभ्यां कनकश्रियम् ॥४६५॥ "आदाय तां यथायोग्य नर्तयन्तौ नृपात्मजाम् । पेठतुर्गुणसंहब्ध मिति ते भाविचक्रिणः ॥१६॥ पृथ्वीच्छन्दः गुणः कुलबलादिभिर्भुवि विजित्य विश्वान मृपान् मनोजमपि लजयन् भववरो वपुःसम्पदा । विदग्धवनिताविलासललितावलोकालयः क्षितेः पतिरनन्तवीर्य इति विश्रुतः पातु वः ॥ ४६७ ॥ अनुष्टुप तदा त छूतिमात्रेण मदनाविष्टविग्रहा । स्तूयते यः स को ब्रूतमित्यप्राक्षीन्नृपात्मजा ॥ ४६८ ॥ प्रभाकरीपुराधीशोऽजनिस्तिमितसागरात् । महामणिरिव क्ष्माभृन्मौलिचूडामणीयितः ॥ ४६९ ॥ कान्ताकल्पलतारोहरम्यकल्पमहीरुहः । कामिनीभ्रमरीभोग्यमुखाम्भोजविराजितः ॥ ४७० ॥ इति तद्वयतद्रपलावण्याद्यनुवर्णनात् । द्विगुणीभूतसम्प्रीतिरित्युवाच खगात्मजा ॥ ४७१। किमसौ लभ्यते द्रष्टुं कन्यके सुष्टु लभ्यते । त्वयेत्यनन्तवीर्यस्य रूपं साक्षात्प्रदर्शितम् ॥ ४७२ ॥ राजाने हम दोनोंको भेजा है। इस प्रकार दूतके साथ वार्तालाप फर वे दोनों शिवमन्दिरनगर पहुँचे और किसी गूढ़ अर्थकी आलोचना करते हुए राजभवनमें प्रविष्ट हुए ।। ४६१-४६२ ॥ वहाँ उन्होंने विद्याधरोंके राजा दमितारिके यथायोग्य दर्शन किये । राजा दमितारिने संतुष्ट होकर उनके साथ शान्तिपूर्ण शब्दोंमें संभाषण किया, उनका आदर-सत्कार किया, दूसरे दिन मनको हरण करनेवाले अङ्गहार, करण, रस औरभावोंसे परिपूर्ण उनका नृत्य देखकर बहुत ही हर्ष तथा संतोषका अनुभव किया ॥ ४६३-४६४ । एक दिन उसने उन दोनोंसे कहा कि 'हे सुन्दरियो ! आप अपनी कला हमारी पुत्रीको सिखला दीजिये' यह कहकर उसने अपनी कनकश्री नामकी पुत्री उन दोनोंके लिए सौंप दी ।। ४६५ ।। वे दोनों उस राजपुत्रीको लेकर यथायोग्य नृत्य कराने लगे। एक दिन उन्होंने भावी चक्रवर्ती के गुणोंसे गुम्फित निम्न प्रकारका गीत गाया॥४६६॥ जिसने अपने कुल बल आदि गुणोंके द्वारा पृथिवी पर समस्त राजाओंको जीत लिया है, जो अपनी शरीर ते कामदेवको भी लज्जित करता है, संसारमें अत्यन्त श्रेष्ठ है, और जो सुन्दर स्त्रियोंके विलास तथा मनोहर चितवनोंका घर है, ऐसा अनन्तवीर्य इस नामसे प्रसिद्ध पृथिवीका स्वामी तुम सबकी रक्षा करें। ॥ ४६७ ॥ उस गीतके सुनते ही जिसके शरीरमें कामदेवने प्रवेश किया है ऐसी राजपुत्रीने उन दोनोंसे पूछा कि 'जिसकी स्तुति की जा रही है वह कौन है ?? यह कहिये । ४६८ ।। उत्तरमें उन्होंने कहा कि 'वह प्रभाकरीपुरीका अधिपति है, राजा स्तिमितसागरसे उत्पन्न हुआ है, महामणिसमान राजाओंके मस्तक पर स्थित चूड़ामणिके समान जान पड़ता है. स्त्रीरूपी कल्पलताके चढ़नेके लिए मानो कल्पवृक्ष ही है, और स्त्रीरूपी भ्रमरीके उपभोग करनेके योग्य मुखकमलसे सशोभित है। ।।४६९-४७०। इस प्रकार उन दोनोंके द्वारा अत्यन्तवीर्य के रूप तथा लावण्य आदिका वर्णन सुनकर जिसकी प्रीति दूनी हो गई है ऐसी विद्याधरकी पुत्री कनकश्री बोली 'क्या वह देखनेको मिल सकता है । उत्तरमें उन्होंने कहा कि 'हे कन्ये ! तुझे अच्छी तरह मिल सकता है। ऐसा १ दूतमालप्य ख०, ग०, ल० । २ यथोचितं ल० । ३ कल्यामाशु शिष्यया सुताम् ख०, म०, २०, म० । कुलाकल्यामाशु क० । ४ हे सुन्दी ! ५ श्रादीय ल०। ६ नृत्तयन्तौ ल०। ७ संदग्ध ख०। संदोह ल। तयोदयं तवयं तेन तस्य रूपलावण्याद्यनुवर्णनात् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy