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________________ द्विषष्टितमं पर्व अवद्विषातां तावेवं राज्यलक्ष्मीकटाक्षगौ । नवं वयः समासाद्य शुक्लाष्टम्य मृतांशुवत् ॥ ४२१ ॥ पर्यायो राज्यभोग्यस्य योग्ययोर्मशनूजयोः । इतीव रतिमच्छेत्सीद्भोगेष्वेतत्पिताऽन्यदा ॥ ४२२ ॥ तदैव तौ समाहूय कुमारावमरोपमौ । अभिषिच्यापयद्राज्यं यौवराज्यं च सोऽस्पृहः ॥ ४२३ ॥ स्वयं स्वयम्प्रभाख्यानजिन पादोपसेवनम् । संयमेन समासाद्य धरणेन्द्रद्धिदर्शनात् ॥ ४२४ ॥ निदानदूषितो बालतपा लोलुतया सुखे । स्वकालान्ते विशुद्धात्मा जगाम धरणेशिताम् ॥ ४२५ ॥ 'तत्पदे तौ समासाद्य बीजमूलाङ्कराविव । नीतिवारीपरीषेकात्सुभूमौ वृद्धिमीयतुः ॥ ४२६ ॥ अभ्युद्यतास्तयोः पूर्वं सप्रतापनयांशवः । आक्रम्य मस्तके चक्रुरास्पदं सर्वभूभृताम् ॥ ४२७ ॥ लक्ष्म्यौ नवे युवानौ यौ तत्प्रीतिः समसंगमात् । भोगासक्तिं व्यधाद्राढं तयोरुद्वतपुण्ययोः ॥ ४२८ ॥ नर्तकी वर्वरीत्येका ख्यातान्या च त्रिलातिका । नृत्यविद्येव सामर्थ्याद् रूपद्वयमुपागता ॥ ४२९ ॥ भूपती तौ तयोर्नृत्यं कदाचिज्जातसम्मदौ । विलोकमानावासीनावागमन्नारदस्तदा ॥ ४३० ॥ सूर्याचन्द्रमसौ सैंहिकेयो वा जनिताशुभः । नृत्तासङ्गात्कुमाराभ्यां क्रूरः सोऽविहितादरः ॥ ४३१ ॥ जाज्वल्यमानकोपाग्निशिखासंप्तमातसः । चण्डांशुरिव मध्याह्ने जज्वाल शुचिसङ्गमात् ॥ ४३२ ॥ स तदैव सभामध्यान्निर्गत्य कलहप्रियः । द्वाक्प्रापत्कोपवेगेन नगरे शिवमन्दिरे ॥ ४३३ ॥ करते थे और न कभी शत्रुओं पर चढ़ाई ही करते थे फिर भी शत्रु राजा उन दोनोंके साथ सदा सन्धि करने के लिए उत्सुक बने रहते थे ।। ४२० ।। इस तरह जिन्हें राज्य लक्ष्मी अपने कटाक्षोंका विषय बना रही है ऐसे वे दोनों भाई नवीन अवस्थाको पाकर शुक्लपक्षकी अष्टमीके चन्द्रमा के समान बढ़ते ही रहते थे । ४२१ । 'अब मेरे दोनों योग्य पुत्रोंकी अवस्था राज्यका उपभोग करनेके योग्य हो गई, ऐसा विचार कर किसी एक दिन इनके पिताने भोगोंमें प्रीति करना छोड़ दिया ॥ ४२२ ।। उसी समय इच्छा रहित राजाने देव तुल्य दोनों भाइयों को बुलाकर उनका अभिषेक किया तथा एकको राज्य देकर दूसरेको युवराज बना दिया ।। ४२३ ॥ तथा स्वयं, स्वयंप्रभ नामक जिनेन्द्रके चरणों के समीप जाकर संयम धारण कर लिया । धरणेन्द्रकी ऋद्धि देखकर उसने निदान बन्ध किया । उससे दूषित होकर बालतप करता रहा । वह सांसारिक सुख प्राप्त करनेका इच्छुक था । आयुके अन्त में विशुद्ध परिणामोंमें मरा और धरणेन्द्र अवस्थाको प्राप्त हुआ ।। ४२४-४२५ ।। इधर जिस प्रकार उत्तम भूमिमें बीज तथा उससे उत्पन्न हुए अंकुर जलके सिंचनसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार वे दोनों भाई राज्य तथा युवराजका पद पाकर नीति रूप जल के सिंचनसे वृद्धिको प्राप्त हुए ।। ४२६ ॥ जिस प्रकार सूर्यकी तेजस्वी किरणें प्रकट होकर सबसे पहले समस्त पर्वतोंके मस्तकों-शिखरों पर अपना स्थान जमाती हैं उसी प्रकार उन दोनों भाइयोंकी प्रकट हुईं प्रतापपूर्ण नीति की किरणोंने आक्रमण कर सर्व प्रथम समस्त राजाओंके मस्तकों पर अपना स्थान जमाया था ।। ४२७ ।। जिनका पुण्य प्रकट हो रहा है ऐसे दोनों भाइयोंकी राजलक्ष्मियाँ नई थीं और स्वयं भी दोनों तरुण थे इसलिए सदृश समागमके कारण उनमें जो प्रीति उत्पन्न हुई थी उसने उनकी भोगासक्तिको ठीक ही बढ़ा दिया था ।। ४२८ ।। उनके बर्बरी और चिलातिका नामकी दो नृत्यकारिणी थीं जो ऐसी जान पड़ती थीं मानों नृत्य-विद्याने ही अपनी सामर्थ्य से दो रूप धारण कर लिये हों ।। ४२६ || किसी एक दिन दोनों राजा बड़े हर्ष के साथ उन नृत्यकारिणियोंका नृत्य देखते हुए सुखसे बैठे थे कि उसी समय नारदजी आ गये ।। ४३० ।। दोनों भाई नृत्य देखने में आसक्त थे अतः नारदजीका आदर नहीं कर सके। वे क्रूर तो पहलेसे ही थे इस प्रकरणसे उनका अभिप्राय और भी खराब हो गया । वे उन दोनों भाइयोंके समीप आते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानो सूर्य और चन्द्रमाके समीप राहु आ रहा हो । अत्यन्त जलती हुई क्रोधाग्निकी शिखाओंसे उनका मन संतप्त हो गया । जिस प्रकार जेठके महीने में दोपहर के समय सूर्य जलने लगता है उसी प्रकार उस समय नारदजी जल रहे थे - अत्यन्त कुपित हो रहे थे । कलहप्रेमी नारदजी उसी समय सभाके १ तत्पदं क० । २ मध्येहि ख० । Jain Education International १६७ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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