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________________ १६६ महापुराणे उत्तरपुराणम द्वीपेऽस्मिन् प्राग्विदेहस्थविलसद्वत्सकावती । देशे प्रभाकरीपुर्या पतिस्तिमितसागरः ॥ ४१२॥ देवी वसुन्धरा जातस्तयोरादित्यचूलवाक् । देवोऽपराजितः सूनुर्नन्द्यावर्ताद् दिवश्च्युतः ॥ ४१३॥ तस्यैवानुमतौ देव्यां मणिचूलोऽप्यभूत्सुतः। श्रीमाननन्तवीर्याख्यो दिविजः स्वस्तिकाच्च्युतः ॥ ४१४॥ कान्त्या कुवलयाहादात्तष्णातापापनोदनात् । कलाधरत्वाद्भातः स्म जम्बूद्वीपविधूपमौ ॥ ४१५॥ पद्मानन्दकरौ १भास्वद्वपुषौ ध्वस्ततामसौ। नित्योदयौ जगन्ने तावाद्यौ वा दिवाकरौ ॥१६॥ न वञ्चकौ कलावन्तौ सप्रतापौ न दाहको । करद्वयव्यपेतौ तौ सत्करौ रेजतुस्तराम् ॥११॥ नोपमानस्तयोः कामो रूपेणानङ्गतां गतः। नीत्या नान्योन्यजेतारौ गुरुशुक्रौ च तत्समौ ॥१८॥ हीयते व ते चापि भास्करेण विनिर्मिता । वर्द्धते तत्कृता छाया वर्द्धमानस्य वा तरोः ॥ ४१९॥ न तयोविंग्रहो यानं तथाप्यरिमहीभुजः। तत्प्रतापभयात्ताभ्यां स्वयं सन्धातुमुल्सुकाः ॥ ४२०॥ उनमेंसे रविचूल नामका देव नन्द्यावर्त विमानसे च्युत होकर जम्बूद्वीपके पूर्वविदेह क्षेत्रमें स्थित वत्सकावती देशकी प्रभाकरी नगरीके राजा स्तिमितसागर और उनकी रानी वसुन्धराके अपराजित नामका पुत्र हुआ। मणिचूल देव भी स्वस्तिक विमानसे च्युत होकर उसी राजाकी अनुमति नामकी रानीसे अनन्तवीर्य नामका लक्ष्मीसम्पन्न पुत्र हुआ॥४१२-४१४॥ वे दोनों ही भाई जम्बूद्वीपके चन्द्रमाओंके समान सुशोभित होते थे क्योंकि जिस प्रकार चन्द्रमा कान्तिसे युक्त होता है उसी प्रकार वे भी उत्तम कान्तिसे युक्त थे, जिस प्रकार चन्द्रमा कुवलय-नील कमलोंको आह्लादित करता है उसी प्रकार वे भी कुवलय-पृथिवी-मण्डलको आह्लादित करते थे, जिस प्रकार चन्द्रमा तृष्ण-तृषा और आतापको दूर करता है। उसी प्रकार वे भी तृष्णा रूपी आतापदुःखको दूर करते थे और जिस प्रकार चन्द्रमा कलाधर-सोलह कलाओंका धारक होता है उसी प्रकार वे भी अनेक कलाओं-अनेक चतुराइयोके धारक थे ।।४१५॥ अथवा वे दोनों भाई बालसूयेके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार बालसूर्य पद्मानन्दकर-कमलोंको आनन्दित करनेवाला होता है उसी प्रकार वे दोनों भाई भी पद्मानन्दकर-लक्ष्मीको आनन्दित करनेवाले थे, जिस प्रकार बालसूर्य भास्वद्वप-देदीप्यमान शरीरका धारक होता है उसी प्रकार वे दोनों भाई भी देदीप्यमान शरीरके धारक थे, जिस प्रकार बालसूर्य ध्वस्ततामस-अन्धकारको नष्ट करनेवाला होता है उसी प्रकार वे दोनों भाई भी ध्वस्ततामस-अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेवाले थे, जिस प्रकार बालसूर्य नित्योदय होते हैं-उनका उद्गमन निरन्तर होता रहता है उसी प्रकार वे दोनों भाई भी नित्योदय थे-उनका ऐश्वर्य निरन्तर विद्यमान रहता था और जिस प्रकार बालसूर्य जगन्नेत्र-जगच्चक्षु नामको धारण करनेवाले हैं उसी प्रकार वे दोनों भाई भी जगन्नेत्र-जगत्के लिए नेत्रके समान थे ।। ४१६॥ वे दोनों भाई कलावान् थे परन्तु कभी किसीको ठगते नहीं थे, प्रताप सहित थे परन्तु किसीको दाह नहीं पहुँचाते थे, दोनों करों-दोनों प्रकार के टैक्सोंसे (आयात और निर्यात करोंसे) रहित होनेपर भी सत्कारउत्तम कार्य करनेवाले अथवा उत्तम हाथोंसे सहित थे इस प्रकार वे अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे ॥४१७ ।। रूपकी अपेक्षा उन्हें कामदेवकी उपमा नहीं दी जा सकती थी क्योंकि वह अशरीरताको प्राप्त हो चुका था तथा नीतिकी अपेक्षा परस्पर एक दूसरेको जीतनेवाले गुरु तथा शुक्र उनके समान नहीं थे। भावार्थ-लोकमें सुन्दरताके लिए कामदेवकी उपमा दी जाती है परन्तु उन दोनों भाइयोंके लिए कामदेवकी उपमा संभव नहीं थी क्योंकि वे दोनों शरीरसे सहित थे और कामदेव शरीरसे रहित था । इसी प्रकार लोकमें नीतिविज्ञताके लिए गुरु बृहस्पति और शुक्र-शुक्राचार्यकी उपमा दी जाती है परन्तु उन दोनों भाइयोंके लिए उनकी उपमा लागू नहीं होती थी क्योंकि गुरु और शुक्र परस्पर एक दूसरेको जीतनेवाले थे परन्तु वे दोनों परस्परमें एक दूसरेको नहीं जीत सकते थे ॥४१८।। सूर्यके द्वारा रची हुई छाया कभी घटती है तो कभी बढ़ती है परन्तु उन दोनों भाइयोंके द्वारा की हुई छाया बढ़ते हुए वृक्षकी छायाके समान निरन्तर बढ़ती ही रहती है ॥४१६ ॥ वे न कभी युद्ध १ ताम्यदपुषौ ल। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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