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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् दभितार सभामध्ये सन्निविष्टं स्वविष्टरे । 'अस्तमस्तकभास्वन्तमिव प्रपतनोन्मुखम् ॥ ४३४ ॥ सयो विलोक्य सोऽप्याशु प्रत्युत्थानपुरस्सरम् । प्रतिगृह्य प्रणम्योच्चविष्टरे सनिवेश्य तम् ॥ ४३५॥ दत्ताशिर्ष किमुद्दिश्य भवन्तो मामुपागताः । सम्पद किं ममादेष्टुं प्राप्ताः किं वा महापदम् ॥ ४३६ ॥ इत्यप्राक्षीदसौ वास्य विकासिवदनाम्बुजः । सम्मदं जनयन् वाचमवोचत्प्रीतिवलिनीम् ॥ ४३७ ॥ सारभूतानि वस्तूनि तवान्वेष्टुं परिभ्रमन् । नर्तकीद्वयमद्राक्षं प्रेक्षायोग्यं तवैव तत् ॥ ४३८ ॥ अस्थानस्थं समीक्ष्यैवमनिष्टं सोदुमक्षमः । आगतोऽहं कथं सहा पादे चूड़ामणिस्थितिः ॥ ४३९ ॥ सम्प्रत्यप्रतिमल्लौ वा नूतनश्रीमदोद्धतौ । प्रभाकरीपुराधीशौ व्यलीकविजिगीषुको । ४४० ॥ सप्तव्यसनसंसक्तौ सुखोच्छंद्यौ प्रमादिनौ । तयोर्गृहे सुखग्राह्यं जगत्सारमवस्थितम् ॥ ४४१ ॥ तद्भूतप्रेषणादेव तवाद्यायाति हेलया। कालहानिर्न कर्तव्या हस्तासन्नेऽतिदुर्लभे ॥ ४४२॥ इत्येवं प्रेरितस्तेन सपापेन यमेन वा । दमितारिः समासनमरणः श्रवणं ददौ ॥ ४४३ ॥ तदैव नर्तकीवार्ताश्रुतिव्यामुग्धचेतनः । दूतं सोपायनं प्रस्तुतार्थसम्बन्धवेदिनम् ॥ ४४४ ॥ प्राहिणोद्वत्सकावत्याः महीशौ शौर्यशालिनौ । प्रति सोऽपि नृपादेशादन्तरेऽहान्यहापयन् ॥ ४४५ ॥ गत्वा जिनगृहे प्रोषधोपवाससमन्वितम् । अपराजितराजं च युवराजं च सुस्थितम् ॥ ४४६॥ दृष्ट्राऽमात्यमुखाद्भूतो निवेदितनिजागमः। यथोचितं प्रदायाभ्यां स्वानीतोपायनं सुधीः ॥ ४४७॥ ज्वलत्यस्य प्रतापाग्निदिव्यायस्पिण्डभास्वरः । कृतदोषान् व्यलीकाभिमानिनो दहति दूतम् ॥४८॥ बीचसे बाहर निकल आये और क्रोधजन्य वेगसे शीघ्र ही शिवमन्दिरनगर जा पहुँचे ॥४३१-४३३॥ वहाँ सभाके बीचमें राजा दमितारि अपने आसनपर वैठा था और ऐसा जान पड़ता था मानो अस्ताचलकी शिखरपर स्थित पतनोन्मुख सूर्य ही हो ।। ४३४ ।। उसने नारदजीको प्राता हुआ देख लिया अतः शीत्र ही उठकर उनका पडिगाहन किया, प्रणाम किया और ऊँचे सिंहासनपर बैठाया ॥४३५ ।। जब नारदजी आशीर्वाद देकर बैठ गये तब उसने पूछा कि आप क्या उद्देश्य लेकर हमारे यहाँ पधारे हैं, क्या मुझे सम्पत्ति देनेके लिए पधारे हैं अथवा कोई बड़ा भारी पद प्रदान करनेक लिए आपका समागम हुआ है ? यह सुनकर नारदजीका मुखकमल खिल उठा। वे राजाको हर्ष उत्पन्न करते हुए प्रीति बढ़ानेवाले वचन कहने लगे ॥ ४३६-४३७ ।। उन्होंने कहा कि हे राजन् ! मैं तम्हारे लिए सारभूत वस्तुएँ खोजनेके लिए निरन्तर घूमता रहता हूँ। मैंने आज दो नृत्यकारिणी देखी हैं जो आपके ही देखने योग्य है ।।४३८ ।। वे इस समय ठीक स्थानोंमें स्थित न ऐसी अनिष्ट बात सहनेके लिए समर्थ नहीं हूँ इसीलिए आपके पास आया हूँ, क्या कभी चूड़ामणिकी स्थिति चरणोंके बीच सहन की जा सकती है ? ॥ ४३६ ।। इस समय जिनसे कोई लड़नेवाला नहीं है. जो नवीन लक्ष्मीके मदसे उद्धत हो रहे हैं और जो झूठमूठके ही विजिगीषु बने हुए हैं ऐसे करी नगरीके स्वामी राजा अपराजित तथा अनन्तवीय है। वे सप्त-व्यसनोंमें आसक्त होकर प्रमादी हो रहे हैं इसलिए सरलतासे नष्ट किये जा सकते हैं। संसारका सारभूत वह नृत्यकारिणियोंका जोड़ा उन्हींके घरमें अवस्थित है। उसे आप सुखसे ग्रहण कर सकते हैं, दूत भेजनेसे वह आज ही लीलामात्रमें तुम्हारे पास आ जावेगा इसलिए अत्यन्त दुर्लभ वस्तु जब हाथके समीप ही विद्यमान है तब समय बिताना अच्छा नहीं ॥ ४४०-४४२ ।। इस प्रकार यमराजके समान पापी नारदने जिसे प्रेरणा दी है तथा जिसका मरण अत्यन्त निकट है ऐसा दमितारि नारदकी बातमें आ गया ॥४४॥ नृत्यकारिणीकी बात सुनते ही उसका चित्त मुग्ध हो गया। उसने उसी समय वत्सकावती देशके पराक्रमी राजा अपराजित और अनन्तबीयके पास प्रकृत अर्थको निवेदन करनेवाला दूत भेंटके साथ भेजा। वह दूत भी राजाकी आज्ञासे बीचमें दिन नहीं बिताता हुआ-शीघ्र ही प्रभाकरीपरी पहुँचा । उस समय दोनों ही भाई प्रोषधोपवासका व्रत लेकर जिनमंदिरमें बैठे हुए थे। उन्हें देखकर बद्धिमान इतने मन्त्रीके मुखसे अपने आनेका समाचार भेजा और अपने साथ लाई हई भेंट दोनों भाइयोंके लिए यथायोग्य समर्पण की ।। ४४४-४४७ ।। वह कहने लगा कि दिव्य लोहेके पिण्डके १ सभास्थाने क०, ग० । २ अस्ताचलशिवरस्थितसूर्यमिव । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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