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________________ द्विषष्टितम पर्व १५६ मात्मप्रदेशसञ्चारो योगो बन्धविधायकः । गुणस्थानम्रये ज्ञेयः सवेद्यस्य स एककः ॥ ३०॥ मानसः स चतुर्भेदस्तावानेव वचःस्थितः। काये सप्तविधः सर्वो यथास्वं द्वयबन्धकृत् ॥ ३१॥ पञ्चभिर्बध्यते मिथ्यावादिभिर्वणितैः सदा । स विंशतिशतेनार्यकर्मणां स्वोचिते पदे ॥ ३११ ॥ जन्तुस्तैद॑भ्यते भूयो भूयो गत्यादिपर्ययः । आश्रितादिगुणस्थानसर्वजीवसमासकः ॥ ३१२ ॥ त्र्यज्ञानदर्शनोपेतस्विभावो वीतसंयमः । भव्योऽभव्यश्च संसारचक्रकावर्तगर्तगः ॥ ३१३ ॥ जन्ममृत्युजरारोगसुखदुःखादिभेदभाक । अतीतानादिकालेऽत्र कश्चित्कालादिलन्धितः ॥ ३१४ ॥ करणत्रयसंशान्तसप्तप्रकृतिसञ्चयः । प्राप्तविच्छिन्नसंसारः शमसम्भूतदर्शनः ॥ ३१५ ॥ अप्रत्याख्यानमिश्राख्यभावाप्तद्वादशव्रतः। प्रत्याख्यानाख्यमिश्राख्यभावावाप्तमहाव्रतः ॥ ३१६ ॥ सप्तप्रकृतिनि शलब्धक्षायिकदर्शनः। मोहारातिविधानोत्थक्षायिकाचारभूषितः ॥ ३१७ ॥ द्वितीयशुक्लसद्ध्यानो घातित्रितयघातकः । नवकेवलभावाप्त्या स्नातकः सर्वैपूजितः ॥ ३१८ ॥ तृतीयशुक्लसद्ध्याननिरुद्धाशेषयोगकः । समुच्छिन्नक्रियायोगाद्विच्छिनाशेषवन्धकः ॥ ३१९ ॥ एवं त्रिरूपसन्मार्गात् क्रमासाद्ववारिधिम् । भन्यो भवादशो भव्य समुत्तीर्येधते सदा ॥ ३२० ॥ इति तां जन्मनिर्वाणप्रक्रियां जिनभाषिताम् । श्रुत्वा पीतामृतो वाऽसौ विश्वविद्याधरेश्वरः ॥ ३२॥ भगवानुने इस कषायके सोलह भेद कहे हैं। यह कषाय उपशान्तमोह गुणस्थानके इसी ओर स्थितिबन्ध तथा अनुभागबन्धका कारण माना गया है।३०८ ॥ आत्माके प्रदेशोंमें जो संचार होता है उसे योग कहते हैं । यह योग ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें इन तीन गुणस्थानोंमें सातावेदनीयके बन्धका कारण माना गया है। इन गुणस्थानोंमें यह एक ही बन्धका कारण है ॥३०६ ॥ मनोयोग चार प्रकारका है, वचन योग चार प्रकारका है और काय-योग सात प्रकारका है। ये सभी योग यथायोग्य जहाँ जितने संभव हो उतने प्रकृति और प्रदेश बन्धके कारण हैं। हे आर्य ! जिनका अभी वर्णन किया है ऐसे इन मिथ्यात्व आदि पाँचके द्वारा यह जीव अपने अपने योग्य स्थानों में एक सौ बीस कर्मप्रकृतियोंसे सदा बँधतारहताहै॥३१०-३१॥ इन्हीं प्रकृतियों के कारण यह जीव गति आदि पर्यायोंमें बार बार घूमता रहता है, प्रथम गुणस्थानमें इस जीवके सभी जीव समान होते हैं, वहाँ यह जीव तीन अज्ञान और तीन अदर्शनोंसे सहित होता है, उसके औदयिक, मायापशमिक और पारिणामिक ये तीन भाव होते हैं, संयमका अभाव होता है, कोई जीव भव्य रहता है और कोई अभव्य होता है। इस प्रकार संसारचक्रके भँवररूपी गड्ढे में पड़ा हुआ यह जीव जन्म जरा मरण रोग सुख दुःख आदि विविध भेदोंको प्राप्त करता हुआ अनादि कालसे इस संसारमें निवास कर रहा है। इनमेंसे कोई जीव कालादि लब्धियोंका निमित्त पाकर अधःकरण अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण रूप परिणामोंसे मिथ्यात्वादि सात प्रकृतियोंका उपशम करता है तथा संसारकी परिपाटीका विच्छेद कर उपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है। तदनन्तर अप्रत्याख्यानावरण कषायके क्षयोपशमसे श्रावकके बारह व्रत ग्रहण करता है। कभी प्रत्याख्यानावरण कषायके क्षयोपशमसे महाव्रत प्राप्त करता है। कभी अनन्तानुबन्धी क्रोध मान माया लोभ तथा मिथ्यात्व सम्यमिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति इन सात प्रकृतियोंके क्षयसे क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है। कभी मोहकर्मरूपी शत्रुके उच्छेदसे उत्पन्न हुए क्षायिक चारित्रसे अलंकृत होता है। तदनन्तर द्वितीय शुक्लध्यानका धारक होकर तीन घातिया कोका क्षय करता है, उस समय नव केवललब्धियोंकी प्राप्तिसे अर्हन्त होकर सबके द्वारा पूज्य हो जाता है । कुछ समय बाद तृतीय शुक्ल ध्यानके द्वारा समस्त योगोंको रोक देता है और समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपाती नामक चौथे शुक्ल ध्यानके प्रभावसे समस्त कर्मबन्धको नष्ट कर देता है। इस प्रकार हे भव्य ! तेरे समान भव्य प्राणी क्रमक्रमसे प्राप्त हुए तीन प्रकारके सन्मार्गके द्वारा संसार-समुद्रसे पार होकर सदा सुखसे बढ़ता रहता है॥३१२-३२०॥ इस प्रकार समस्त विद्याधरोंका स्वामी अमिततेज, श्रीजिनेन्द्र भगवानके द्वारा १ पातित्रय-ख०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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