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________________ १६० महापुराणे उत्तरपुराणम् कालायुक्तचतुर्भेदप्रायोग्यप्रापणासदा । सम्यश्रद्धानसंशुद्धः श्रावकवतभूषितः॥३२॥ भगवन् किश्चिदिच्छामि प्रष्टुमन्यच्च चेतसि । स्थितं मेऽशनिघोषोऽयं प्रभावं तन्वतोऽवयन् ॥ ३२३ ॥ सुतारां मेऽनुजामेव इतवान् केन हेतुना । इत्यवाक्षीजिनेन्द्रोऽपि हेतुं तस्यैवमबवीत् ॥ २४ ॥ जम्बूपलक्षिते द्वीपे विषये मगधाहये । अचलग्रामवास्तव्यो ब्राह्मणो धरणीजटः॥ ३२५॥ अग्निला गृहिणी तोको भूत्यन्तेद्राग्निसंज्ञको । कपिलस्तस्य दासेरस्तद्वेदाध्ययने स्वयम् ॥ ३२६ ॥ वेदान्स सूक्ष्मबुद्धित्वावज्ञासीद् ग्रन्थतोऽर्थतः। तं ज्ञात्वा ब्राह्मणः क्रुद्ध्वा स्वयाऽयोग्यमिदं कृतम्॥३२७॥ इति दासीसुतं गेहासदैव निरजीगमत् । कपिलोऽपि विषण्णत्वात्तस्माद्रत्न पुरं ययौ ॥ ३२८ ॥ श्रुत्वाऽध्ययनसम्पन्न योग्य तं वीक्ष्य सत्यकः । विप्रः स्वतनुजां जम्बूसमुत्पनां समर्पयत् ॥३२९ ॥ स राजपूजितस्तत्र सर्वशास्त्रार्थसारवित् । व्याख्यामखण्डितां कुर्वमनयत्कतिचित्समाः ॥ ३३०॥ तस्य विप्रकुलायोग्यचरित्रविमर्शनात् । तद्भार्या सत्यभामाऽयं रकस्येत्यायत्तसंशया ॥३३॥ बार्तापरम्पराज्ञातस्वकीयप्राभवं द्विजम् । स्वदारिद्रयापनोदार्थ स्वान्तिकं समुपागतम् ॥ ३३२ ॥ दूरात् कपिलको दृष्टा दुष्टात्मा धरिणीजटम् । कुपितोऽपि मनस्यस्मै प्रत्युत्थायाभिवाद्य च ॥२३३॥ समुच्चासनमारोप्य मातुर्धानोश्च किं मम । कुशलं ब्रूत मद्भाग्यायूयमत्रैवमागताः ॥ ३३४ ॥ कही हुई जन्मसे लेकर निर्वाण पर्यन्तकी प्रक्रियाको सुनकर ऐसा संतुष्ट हुआ मानो उसने अमृतका ही पान किया हो ॥ ३२१ ॥ ऊपर कही हुई कालादि चार लब्धियोंकी प्राप्तिसे उस समय उसने सम्यग्दर्शनसे शुद्ध होकर अपने आपको श्रावकोंके व्रतसे विभूषित किया ॥३२२॥ उसने भगवान्से पूछा कि हे भगवन् ! मैं अपने चित्तमें स्थित एक दूसरी बात आपसे पूछना चाहता हूँ। बात यह है कि इस अशनिघोषने मेरा प्रभाव जानते हुए भी मेरी छोटी बहिन सुताराका हरण किया है सो किस कारणसे किया है ? उत्तरमें जिनेन्द्र भगवान् भी उसका कारण इस प्रकार कहने लगे ।। ३२३-३२४ ॥ जम्बूद्वीपके मगध देशमें एक अचल नामका ग्राम है। उसमें धरणीजट नामका ब्राह्मण रहता था ॥ ३२५ ।। उसकी स्त्रीका नाम अग्निला था और उन दोनोंके इन्द्रभूति तथा अग्निभूति नामके दो पुत्र थे। इनके सिवाय एक कपिल नाम दासीपुत्र भी था। जब वह ब्राह्मण अपने पुत्रोंको वेद पढ़ाता था तब कपिलको अलग रखता था परन्तु कपिल इतना सूक्ष्मबुद्धि था कि उसने अपने आप ही शब्द तथा अर्थ-दोनों रूपसे वेदोंको जान लिया था। जब ब्राह्मणको इस बातका पता चला तब उसने कुपित होकर 'तूने यह अयोग्य किया' यह कहकर उस दासी-पुत्रको उसी समय घरसे निकाल दिया। कपिल भी दुःखी होता हुआ वहाँ से रनपुर नामक नगरमें चला गया ।। ३२६३२८ ॥ रत्नपुरमें एक सत्यक नामक ब्राह्मण रहता था। उसने कपिलको अध्ययनसे सम्पन्न तथा योग्य देख जम्बू नामक स्त्रीसे उत्पन्न हुई अपनी कन्या समर्पित कर दी ।। ३२६ । इस प्रकार राजपूज्य एवं समस्त शास्त्रोंके सारपूर्ण अर्थके ज्ञाता कपिलने जिसको कोई खण्डन न कर सके ऐसी व्याख्या करते हुए रत्नपर नगरमें कुछ वर्ष व्यतीत किये ॥ ३३० ॥ कपिल विद्वान् अवश्य था परन्तु उसका आचरण ब्राह्मण कुलके योग्य नहीं था अतः उसकी स्त्री सत्यभामा उसके दुश्चरितका विचार कर सदा संशय करती रहती थी कि यह किसका पुत्र है? ॥३३१॥ इधर धरिणीजट दरिद्ध हो गया। उसने परम्परासे कपिलके प्रभावकी सब बातें जान लीं इसलिए वह अपनी दरिद्रता दूर करनेके लिए कपिलके पास गया। उसे आया देख कपिल मन ही मन बहत कुपित हुआ परन्तु बाह्यमें उसने उठकर अभिवादन-प्रणाम किया। उच्च आसन पर बैठाया और कहा कि कहिये मेरी माता तथा भाइयोंकी कुशलता तो है न ? मेरे सौभाग्यसे आप यहाँ पधारे यह १धरणीजड़ः ख०, ल० । २ कत्येत्यायत्तसंशयंम् क०, १०। कस्येत्यायत्तसंशयः ल०।३ द्विजा ग। धरिडीजल। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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