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________________ १३५ एकषष्टितम पर्व साईद्विचत्वारिंशचापोच्छृितिः कनकधतिः । षट् खण्डमण्डितां पृथ्वी प्रतिपाल्य प्रतापवान् ॥ १४ ॥ चतुर्दशमहारत्नभूषणो विधिनायकः । नृखेचरसुराधीशानमयन् क्रमयोर्युगम् ॥ ९५ ॥ स्वोक्तप्रमाणदेवीभिरनुभूय यथेप्सितत् । दशाङ्गभोगान् भूयिष्ठान् सुनिष्ठितमनोरथः ॥ १६ ॥ सुधीर्मनोहरोद्याने स कदाचियहच्छया। विलोक्याभयघोषाल्य केवलावगमद्युतिम् ॥ १७ ॥ त्रिःपरीत्याभिवन्यैनं श्रुत्वा धर्म तदन्तिके । विदित्वा तत्त्वसद्भाव विरज्य विषयेष्वलम् ॥ १८ ॥ प्रियमित्राय पुत्राय दत्त्वा साम्राज्यसम्पदम् । स बाह्याभ्यन्तरग्रन्थाँस्त्यक्त्वा संयममाददौ ॥ ९९ ॥ शुद्धश्रद्धानचारित्रः श्रुतसम्पत्समन्धितः । द्वितीयशुक्लध्यानेन घातित्रयविघातकृत् ॥ १० ॥ भवकेवललब्धीशो धर्मवद्धर्मदेशनात् । विनेयनायकात्रीत्वा निर्वाणपदवीं पराम् ॥ १.१॥ ध्यानद्वयसमुन्मूर्छिताघातिकचतुष्ककः । पुण्यापुण्यविनिर्मोक्षादक्षयं मोक्षमाक्षिपत् ॥ १.२ ॥ मालिनी नरपतिरिह नाम्ना वासुपूज्यस्य तीर्थे ___ सशमगुरुचरित्रेणाहमिन्द्रो महद्धिः । अभवदखिलपुण्यश्चक्रवर्ती तृतीय स्तदनु च मघवाख्यो मुख्यसौख्यं समापत् ॥ १० ॥ समनन्तरमेवास्य विनीतानगरेशिनः । नृपस्यानन्तवीर्यस्य सूर्यवंशशिखामणेः ॥१०॥ सहदेव्याश्च सम्भूतः कल्पादागत्य षोडशात् । सूनुः सनत्कुमाराख्यः प्रियश्चक्राङ्कितश्रियः ॥ १.५॥ लक्षत्रयायुःपूर्वोक्तचक्रवतिंसमुच्छ्रितिः। चामीकरच्छविः स्वेच्छावशीकृतवसुन्धरः ॥ १०६ ॥ देशकी अयोध्यापुरीके स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा सुमित्रकी भद्रारानीसे मघवान् नामका पुण्यात्मा पुत्र हुश्रा । यही आगे चलकर भरत क्षेत्रका स्वामी चक्रवर्ती होगा। उसने पाँच लाख वर्षकी कल्याणकारी उत्कृष्ट आयु प्राप्त की थी। साढ़े चालीस धनुष ऊँचा उसका शरीर था, सुवर्णके समान शरीरकी कान्ति थी। वह प्रतापी छह खण्डोंसे सुशोभित पृथिवीका पालनकर चौदह महारत्नोंसे विभूषित एवं नौ निधियोंका नायक था। वह मनुष्य, विद्याधर और इन्द्रोंको अपने चरणयुगलमें झुकाता था । चक्रवर्तियोंकी विभूतिके प्रमाणमें कही हुई-छयानबे हजार देवियोंके साथ इच्छानुसार दश प्रकारके भोगोंको भोगता हुआ वह अपने मनोरथ पूर्ण करता था। किसी एक दिन मनोहर नामक उद्यानमें अकस्मात् अभयघोष नामक केवली पधारे। उस बुद्धिमान्ने उनके दर्शन कर तीन प्रदक्षिणाएँ दी, वन्दना की, धर्मका स्वरूप सुना, उनके समीप तत्त्वोंके सद्भावका ज्ञान प्राप्त किया, विषयोंसे अत्यन्त विरक्त होकर प्रियमित्र नामक पुत्रके लिए साम्राज्य पदकी विभूति प्रदान की और बाह्याभ्यन्तर परिग्रहका त्यागकर संयम धारण कर लिया ॥६१-६६ ॥ वह शुद्ध सम्यग्दर्शन तथा निर्दोष चरित्रका धारक था, शास्त्रज्ञान रूपी सम्पत्तिसे सहित था, उसने द्वितीय शुक्लध्यानके द्वारा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कोका विघात कर दिया था ॥ १०॥ अब वे नौ केवललब्धियोंके स्वामी हो गये तथा धर्मनाथ तीर्थ समान धर्मका उपदेश देकर अनेक भव्य जीवोंको अतिशय श्रेष्ठ मोक्ष पदवी प्राप्त कराने लगे ॥ १०१॥ अन्तमें शुक्लध्यानके तृतीय और चतुर्थ भेदके द्वारा उन्होंने अघाति चतुष्कका क्षय कर दिया और पुण्य-पाप कर्मोसे विनिमुक्त होकर अविनाशी मोक्ष प्राप्त किया ॥ १०२ ।। तीसरा चक्रवर्ती मघवा पहले वासुपूज्य स्वामीके तीर्थमें नरपति नामका राजा था, फिर उत्तम शान्तिसे श्रेष्ठ चारित्रके प्रभावसे बड़ी ऋद्धिका धारक अहमिन्द्र हुआ, फिर समस्त पण्यसे युक्त मघवा नामका तीसरा चक्रवर्ती हुआ और तत्पश्चात मोक्षके श्रेष्ठ सुखको प्राप्त हुआ ॥१०३ ।। अथानन्तर-मघवा चक्रवर्तीके बाद ही अयोध्या नगरीके अधिपति, सूर्य वंशके शिरोमणि राजा अनन्तवीर्यकी सहदेवी रानीके सोलहवें स्वर्गसे आकर सनत्कुमार नामका पुत्र हुआ। वह चक्रवर्तीकी लक्ष्मीका प्रिय वल्लभ था ॥ १०४-१०५ ।। उसकी आयु तीन लाख वर्षकी थी, और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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