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________________ १३४ महापुराणे उत्तरपुराणम किल खलविधिनैवं पश्य विश्लेषितौ धिग दुरितपरवशत्वं केशवस्यैव मोहात् ॥ ८४ ॥ वसन्ततिलका प्राग्भूभुजः (१) प्रथितराजगृहे सुमित्रो माहेन्द्रकल्पजसुरश्च्युतवाँस्ततोऽस्मिन् । भूपोऽभवत्खगपुरे पुरुषादिसिंहः पश्चात्ससप्तममहीं च जगाम भीमाम् ॥ ८५॥ प्रोदर्पदन्तिदमनोऽजनि राजसिंहो भ्रान्त्वा चिरं भववनेषु विनष्टमार्गः। एष्टानुमार्गमजनिष्ट स हास्तिनाख्ये क्रीडाक्षरान्तमधुराप गतिं दुरन्ताम् ॥ ८६ ॥ पृथ्वी नरादिवृषभः पुरे विदितवीतशोके महीट् तपश्चिरमुपास्य घोरमभवत्सहस्रारके। ततः खगपुरे बलः क्षयितशत्रुपक्षोऽगमत् क्षमैकनिलयो विलीनविलयः सुखं क्षायिकम् ॥ ७ ॥ सत्तीर्थस्यान्तरे चक्री तृतीयो मघवानभूत् । आतृतीयभवाचस्य पुराणं प्रणिगद्यते ॥४८॥ बासुपूज्यजिनेशस्य तीर्थेऽभून्नृपतिर्महान् । नाम्ना नरपतिर्भुक्त्वा भोगान् भाग्यसमपितान् ॥ ८९ ॥ वैराग्यकाष्ठामारुह्य कृतोत्कृष्टतपा व्यसुः। प्रैवेयकेऽभवत्पुण्यादहमिन्द्रेषु मध्यमे ॥ ९ ॥ सप्तविंशतिवादृायुदिव्यभोगान्मनोहरान् । अनुभूय ततश्च्युत्वा धर्मतीर्थकरान्तरे ॥ ११ ॥ कोशले विषये रम्ये साकेतनगरीपतेः । इक्ष्वाकोः स सुमित्रस्य भद्रायाश्च सुतोऽभवत् ॥ १२ ॥ मघवानाम पुण्यात्मा भविष्यन् भरताधिपः । पश्चलक्षसमाजीवी कल्याणपरमायुषा ।। ९३ ॥ ॥३॥ देखो, दोनों ही भाई शत्रुसेनाको नष्ट करने वाले थे, अभिमानी थे, शूर वीर थे, पुण्यके फलका उपभोग करनेवाले थे, और तीन खण्डके स्वामी थे फिर भी इस तरह दुष्ट कर्मके द्वारा अलग-अलग कर दिये गये । मोहके उदयसे पापका फल नारायणको ही प्राप्त हुआ इसलिए पामोंकी अधीनताको धिक्कार है ।।८४॥ पुरुषसिंह नारायण, पहले प्रसिद्ध राजगृह नगरमें सुमित्र नामका राजा था, फिर माहेन्द्र स्वर्गमें देव हुआ, वहाँसे च्युत होकर इस खगपुर नगरमें पुरुषसिंह नामका नारायण हुश्रा और उसके पश्चात् भयंकर सातवें नरकमें नारकी हुआ॥८५। प्रतिनारायण पहले मदोन्मत्त हाथियोंको वश करने वाला राजसिंह नामका राजा था, फिर मार्गभ्रष्ट होकर चिरकाल तक संसाररूपी वनमें भ्रमण करता रहा, तदनन्तर धर्ममार्गका अवलम्बन कर हस्तिनापुर नगरमें मधुक्रीड हुआ और उसके पश्चात् दुर्गतिको प्राप्त हुआ ॥८६॥ सुदर्शन बलभद्र, पहले प्रसिद्ध पीतशोक नगरमें नरवृषभ नामक राजा था, फिर चिरकाल तक घोर तपश्चरण कर सहस्त्रार स्वर्गमें देव हुआ, फिर वहाँसे चय कर खगपुर नगरमें शत्रुओंका पक्ष नष्ट करनेवाला बलभद्र हुआ और फिर क्षमाका घर होता हुआ मरणरहित होकर क्षायिक सुखको प्राप्त हुआ॥७॥ ___ इन्हीं धर्मनाथ तीर्थकरके तीर्थमें तीसरे मघवा चक्रवर्ती हुए इसलिए तीसरे भवसे लेकर उनका पुराण कहता हूँ॥८॥श्रीवासुपूज्य तीर्थकरके तीर्थमें नरपति नामका एक बड़ा राजा था वह भाग्योदयसे प्राप्त हुए भोगोंको भोग कर विरक्त हुआ और उत्कृष्ट तपश्चरण कर मरा । अन्तमें पुण्योदयसे मध्यम प्रैवेयकमें अहमिन्द्र हुआ ।।८९-६०॥ सत्ताईस सागर तक मनोहर दिव्य भोगोंको भोगकर वह वहाँसे च्युत हुआ और धर्मनाथ तीर्थंकरके अन्तरालमें कोशल नामक मनोहर १ विगता प्रसवः प्राणा यस्य सः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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