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________________ षष्टितमं पर्व अनन्तोऽनन्तदोषाणां हन्ताऽनन्तगुणाकरः । हन्त्वन्तर्वान्तसन्तानमन्तातीतं जिनः स नः ॥१॥ धातकीखण्डप्राग्भागमेरूदग्विषये महत् । रम्यं पुरमरिष्टाख्यमैकध्यमिव सम्पदाम् ॥२॥ 'पतिः पद्मरथस्तस्य पद्मासद्म स्वयं गुणैः । यस्मिन् महीं चिरं पाति प्रापन्प्रीतिं परां प्रजाः ॥३॥ पुण्योदयात्सुरूपादिसामग्रीसुखसाधिनी । जन्तोस्तदुदयस्तस्मिन्पुष्कलोऽस्ति निरर्गलः ॥ ४॥ तदिन्द्रियार्थसान्निध्यसमुद्भूतसुखेन सः। शक्रवत्सुष्टु सन्तृप्यन्संसारसुखमन्वभूत् ॥ ५ ॥ अथान्यदा समासाद्य स्वयम्प्रभजिनाधिपम् । सप्रश्रयमभिष्टुत्य श्रुत्वा धर्म सुनिर्मलम् ॥ ६ ॥ संयोगो देहिनां देहैरक्षाणां च स्वगोचरैः । अनित्योऽन्यतराभावे सर्वेपामाजवजवे ॥ ७ ॥ आहितान्यमताः सन्तु देहिनो मोहिताशयाः। अहं निहतमोहारिमाहात्म्याहत्क्रमाश्रयः ॥८॥ करवाणि कथङ्कारं मतिमेतेषु निश्चलाम् । इति मोहमहाग्रन्थिमुद्भिद्यास्योद्ययौ मतिः ॥ ९ ॥ ततः परीतदावाग्निशिखासन्त्रासितैणवत् । चिरोषितां च संसारस्थली हातुं कृतोद्यमः ॥१०॥ सूनौ घनरथे राज्यं नियोज्यादाय संयमम् । एकादशाङ्गवाराशिपारगो बद्धतीर्थकृत् ॥ १३ ॥ प्रान्ते स्वाराधनां प्राप्य परित्यक्तशरीरकः । अभूत् पर्यन्तकल्पेन्द्रः पुष्पोत्तरविमानजः ॥ १२॥ द्वाविंशत्यब्धिमानायुर्हस्ता.नधनुस्तनुः । शुक्ललेश्यः श्वसनेकादशमासैस्तु सङ्ख्यया ॥ १३॥ अथानन्तर जो अनन्त दोषोंको नष्ट करनेवाले हैं तथा अनन्त गुणोंकी खान-स्वरूप हैं ऐसे श्री अनन्तनाथ भगवान हम सबके हृदयमें रहनेवाले मोहरूपी अन्धकारकी सन्तानको नष्ट करें ॥शा धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व मेरुसे उत्तरकी ओर विद्यमान किसी देशमें एक अरिष्ट नामका बड़ा सुन्दर नगर है जो ऐसा जान पड़ता है मानो समस्त सम्पदाओंके रहनेका एक स्थान ही हो ॥२॥ उस नगरका राजा पद्मरथ था, वह अपने गुणोंसे पद्मा-लक्ष्मीका स्थान था, उसने चिरकाल तक पृथिवीका पालन किया जिससे प्रजा परम प्रीतिको प्राप्त होती रही ॥३॥ जीवोंको सुख देनेवाली उत्तम रूप आदिकी सामग्री पुण्योदयसे प्राप्त होती है और राजा पद्मरथके वह पुण्यका उदय बहुत भारी तथा बाधारहित था ॥४॥ इसलिए इन्द्रियोंके विषयोंके सान्निध्यसे उत्पन्न होने वाले सुखते वह इन्द्रके समान संतुष्ट होता हुआ अच्छी तरह संसारके सुखका अनुभव करता था ॥५॥ किसी एक दिन वह स्वयंप्रभ जिनेन्द्रके समीप गया। वहाँ उसने विनयके साथ उनकी स्तुति की और निर्मल धर्मका उपदेश सुना॥६॥ तदनन्तर वह चिन्तवन करने लगा कि 'जीवोंका शरीरके साथ और इन्द्रियोंका अपने विषयोंके साथ जो संयोग होता है वह अनित्य है क्योंकि इस संसारमें सभी जीवोंके आत्मा और शरीर तथा इन्द्रियाँ और उनके विषय इनमेंसे एकका अभाव होता ही रहता है ॥७॥ यदि अन्य मतावलम्बी लोगोंका आशय मोहित हो तो भले ही हो मैंने तो मोहरूपी शत्रुके माहात्म्यको नष्ट करनेवाले अर्हन्त भगवान्के चरण-कमलोंकाआश्रय प्राप्त किया है। मैं इन विपयोंमें अपनी बुद्धि स्थिर कैसे कर सकता हूँ-इन विषयोंको नित्य किस प्रकार मान सकता हूँ। इस प्रकार इसकी बुद्धि मोहरूपी महागॉठको खोलकर उद्यम करने लगी ।।८-६।। तदनन्तर जिस प्रकार चारों ओर लगी हुई वनाग्निकी ज्वालाओंसे भयभीत हुआ हरिण अपने बहत पुराने रहनेके स्थानको छोड़नका उद्यम करता है उसी प्रकार वह राजा भी चिरकालसे रहनेके स्थान-स्वरूप संसाररूपी स्थलीको छोड़नेका उद्यम करने लगा ॥ १०॥ उसने घनरथ नामक पुत्रके लिए राज्य देकर संयम धारण कर लिया और ग्यारह अंगरूपी सागरका पारगामी होकर तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध किया ॥ ११॥ अन्तमें सल्लेखना धारण कर शरीर छोड़ा और अच्युत स्वर्गके पुष्पोत्तर विमानमें इन्द्रपद प्राप्त किया ॥ १२ ॥ वहाँ उसकी आयु बाईस सागर थी, शरीर साढ़े तीन हाथका था, शुक्ललेश्या थी, वह १ सम्पदा ग०, घ० । २ पतिपपरथस्तस्य ग० । ३ संतृप्य क., ग०, घ०। ४ विहत क०, १० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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