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________________ ०२० महापुराणे उत्तरपुराणम् सस्थावरसम्भ्रान्तः पश्चाजातोऽतिदारुणः । ततस्तमस्तमस्यासीत्सर्पस्तस्मात नारकः ॥३१॥ बहुयोनिपरित्रान्तो मृगशृङ्गो मृतस्ततः । विद्युहंष्टः खगाधीशः पापी पश्चात् प्रसनवान् ॥ १५॥ भद्रामित्रवणिक सिंहचन्द्रः प्रीतिकरः सुरः । चक्रायुधो विधूताष्टकर्मा निर्वाणमापिवान् ॥ ३॥६॥ वसन्ततिलका एवं चतुर्गतिपु ते चिरमुच्चनीच स्थानानि कर्मपरिपाकवशात् प्रपद्य । सौख्यं वचित् कचिदयाचितमुग्रदुःखमापंस्त्रयोऽत्र परमात्मपदं २प्रसजाः ॥ ३१ ॥ मालिनी खलखगमकृतोग्रोपद्रव कस्यचिद्वा मनसि शमरसत्वान्मन्यमानो महेच्छः । शुचितरवरशुक्लध्यानमध्यास्य शुद्धि समगमदमलो यः सञ्जयन्तः स वोऽव्यात् ॥ ३१८ ।। रथोद्धता मेरुमन्दरमहाभिधानको स्तामिनेन्दुविजयावृतौजसौ। पूजितौ मुनिगणाधिनायकौ नायको नयमयागमस्य वः ॥ ३१९ ॥ इत्या भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे विमलतीर्थकर-धर्म-स्वयम्भू-मधु सब्जयन्त-मेरुमन्दरपुराणं परिसमाप्तम् एकोनषष्टितम पर्व ॥ ५९ ॥ सर्प, चमर, कुर्कुट सर्प, तीसरे नरकका दुःखी नारकी, अजगर, चौथे नरकका नारकी, त्रस और स्थावरोंके बहुत भव अति दारुण, सातवें नरकका नारकी, सर्प, नारकी, अनेक योनियों में भ्रमण कर मृगशृङ्ग और फिर मरकर पापी विद्यदंष्ट्र विद्याधर हुआ एवं पीछेसे वैररहित-प्रसन्न भी हो गया था॥ ३१३-३१५ ।। भद्रमित्र सेठका जीव सिंहचन्द्र, प्रीतिंकरदेव और चक्रायुधका भव धारण कर पाठों कर्मोको नष्ट करता हुआ निर्वाणको प्राप्त हुआ था ॥ ३१६॥ इस प्रकार कहे हुए तीनों ही जीव अपने-अपने कर्मोदयके वश चिरकाल तक उच्च-नीच स्थान पाकर कहीं तो सुखका अनुभव करते रहे और कहीं बिना माँगे हुए तीव्र दुःख भोगते रहे परन्तु अन्नमें तीनों ही निष्पाप होकर परमपदको प्राप्त हुए ।।३१७ ।। जिन महानुभावने हृदयमें समता रनके विद्यमान रहनेसे दुष्ट विद्याधरके द्वारा किये हुए भयंकर उपसर्गको 'यह किसी विरले ही भाग्यवान्को प्राप्त होता है। इस प्रकार विचार कर बहुत अच्छा माना और अत्यन्त निर्मल शुक्लध्यानको धारण कर शुद्धता प्राप्त की वे कर्ममल रहित संजयन्त स्वामी तुम सबकी रक्षा करें ॥३१८।। जिन्होंने सूर्य और चन्द्रमाको जीतकर उत्कृष्ट तेज प्राप्त किया है, जो मुनियोंके समूहके स्वामी हैं, तथा नयोंसे परिपूर्ण जैनागमके नायक हैं ऐसे मेरु और मंदर नामके गणधर सदा आपलोगोंसे पूजित रहें-आपलोग सदा उनकी पूजा करते रहें ।। ३१६ ।। इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुण भद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन करनेवाला उन- सठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।। १ विद्युदंष्ट्रखगाधीशः क, ख, ग, घ० । २ प्रपन्नाः ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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