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________________ ११२ महापुराणे उत्तरपुराणम् अगन्धनस्तु तद्वतौ भस्मितः कोपमानवान् । कालकाख्ये बने जज्ञे सलोभनमरो मृगः ॥१९॥ सिंहसेनोऽपि कालान्ते सामजः सल्लकीवने । सम्भूयाशनिघोषाख्यां समवाप मदोधुरः ॥ १९७ ।। सिंहचन्द्रोऽभवद्राजा यौवराज्येऽजनीतरः । भुम्जानयोस्तयोलक्ष्मी काले क्षण इवायति ॥ १९८ ॥ कदाचित्सिहसेनोपरतवार्ताश्रुतेरिते' । द्रष्टुं दान्तहिरण्यादिमती संयमसंयुते ॥ १९९ ॥ समीपे रामदत्तापि तयोः संयममाददौ । तच्छोकात्सिहचन्द्रोऽपि पूर्णचन्द्रयतिं श्रितः ॥ २० ॥ श्रुत्वा धर्ममिदं जन्म यदि याति वृथा नृणाम् । कुतः पुनरिहोत्पतिर्धान्तिरेवेति चिन्तयन् ॥ २०१॥ कृत्वा राज्येऽनुजन्मानं द्वितीयं प्राप्य संयमे । गुणस्थानं विशुद्धथन् स ४प्रमादपरिवर्जनात् ॥२०२॥ खचारणत्वं तुर्यावगमोत्कर्ष च लब्धवान् । रामदत्ता कदाचितं रष्ट्रा सम्जातसम्मदा ॥ २०३ ॥ मनोहरवनोद्याने वन्दित्वा विधिपूर्वकम् । ततपोविनसम्प्रभपर्यन्ते पुत्रवत्सला ॥ २०४॥ पूर्णचन्द्रः परित्यज्य धर्म भोगे कृतादरः । प्रत्येत्युत न वा धर्ममसावित्यन्वयुक्त सा ॥ २०५॥ प्रत्याह सिंहचन्द्रोऽपि युष्मद्धर्म ग्रहीष्यसि । मा भूत्खेदः कथां चास्य शृणुतान्यभवाश्रिताम् ॥ २०६॥ कौशले विषये वृद्धग्रामे नाम्ना मृगायणः । विप्रस्तस्याभवद्धर्मपत्नी च मधुराइया ॥ २० ॥ तत्सुता वारुणीसम्ज्ञा जीवितान्ते मृगायणः । साकेताधीशिनो दिव्यबलस्य सुमतेश्च सः ॥ २०८॥ सुता हिरण्यवत्यासीत्सुरम्यविषये पुरे। पोदनेऽधीशिने पूर्णचन्द्रायादायि सा सती॥ २०१॥ आये हों॥१६५ ॥ परन्तु अगन्धन क्रोध और मानसे भरा था अतः उस अग्निमें जल गया और मरकर कालक नामक वनमें लोभ सहित चमरी जातिका मृग हआ।। १४६॥ राजा सिंहसेन भी आयुके अन्तमें मरकर सल्लकी वनमें अशनिघोष नामका मदोन्मत्त हाथी हुआ ॥ १६७॥ इधर सिंहचन्द्र राजा हुआ और पूर्णचन्द्र युवराज बना। राज्यलक्ष्मीका उपभोग करते हुए उन दोनोंका बहुत भारी समय जब एक क्षणके समान बीत गया ॥ १६८ ॥ तब एक दिन राजा सिंहसेनकी मृत्युके समाचार सुननेसे दान्तमति और हिरण्यमति नामकी संयम धारण करनेवाली आर्यिकाएँ रानी रामदत्ताके पास आई। १६६ ॥ रामदत्ताने भी उन दोनोंके समीप संयम धारण कर लिया। इस शोकसे राजा सिंहचन्द्र पूर्णचन्द्र नामक मुनिराजके पास गया और धर्मोपदेश सुनकर यह विचार करने लगा कि यदि यह मनुष्य-जन्म व्यर्थ चला जाता है तो फिर इसमें उत्पत्ति किस प्रकार हो सकती है, इसमें उत्पत्ति होनेकी आशा रखना भ्रम मात्र है अथवा नाना योनियों में भटकना ही बाकी रह जाता है ॥२००-२०१ ॥ इस प्रकार विचार कर उसने छोटे भाई पूर्णचन्द्रको राज्यमें नियक्त किया और स्वयं दीक्षा धारण कर ली। वह प्रमादको छोड़कर विशुद्ध होता हा संयमके द्वितीय गुणस्थान अर्थात् अप्रमत्त विरत नामक सप्तम गुणस्थानको प्राप्त हुआ ॥२०२।। तपके प्रभावसे उसे आकाशचारण ऋद्धि तथा मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। किसी समय रामदत्ता सिंहचन्द्र मुनिको देखकर बहुत ही हर्षित हुई ।। २०३ ।। उसने मनोहरवन नामके उद्यानमें विधि पूर्वक उनकी वन्दना की, तपके निर्विघ्न होनेका समाचार पूछा और अन्तमें पुत्रस्नेह के कारण यह पूछा कि पूर्णचन्द्र धर्मको छोड़कर भोगोंका आदर कर रहा है वह कभी धर्मको प्राप्त होगा या नहीं ? ॥२०४-२०५ ।। सिंहचन्द्र मुनिने उत्तर दिया कि खेद मत करो, वह अवश्य ही तुमसे अथवा तुम्हारे धर्मको ग्रहण करेगा। मैं इसके अन्य भवसे सम्बन्ध रखने वाली कथा कहता हूँ सो सुनो ॥२०६॥ । देशके वृद्ध नामक ग्राममें एक मृगायण नामका ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्रीका नाम मधरा था ॥२०७॥ उन दोनोंके वारुणी नामकी पुत्री थी, मृगायण आयुके अन्तमें मरकर साकेतनगरके राजा दिव्यबल और उसकी रानी सुमतिके हिरण्यवती नामकी पुत्री हुई। वह सती SIN५६ १ मरणवार्ताश्रवणात् इते-प्राते समागतवत्यौ इत्यर्थः। २ संयमम् क०, ग०, ५० ! ३ सन् २०, ख., ग०, घ०, स०, ०। ४ प्रमादपरिमार्जनात् क०, प० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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