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________________ एकोनषष्टितम प 1 द्वयेन तेन बध्नाति दुरायुर्दुष्टचेष्टया । दुर्गतौ तचिरं दुःखं दुरन्तं ह्यनुभावयेत् ॥ १८२ ॥ सौजन्यं हन्यते भ्र'शो विश्रम्भस्य धनादिषु । विपत्तिः प्राणपर्यन्ता मित्रबन्ध्वादिभिः सह ॥ १८३॥ गुणप्रसवसन्दृब्धा कीर्तिरम्लानमालिका । लतेव दावसंश्लिष्टा सद्यचौर्येण हन्यते ॥ १८४ ॥ इसीदं जानता सर्वं सत्यघोषेण दुर्धिया । आद्यांशकेन चौर्येण साहसं तदनुष्टितम् ॥ १८५ ॥ सद्यो मन्त्रिपदाद् भ्रष्टो निग्रहं तादृशं गतः । दुर्गतिं च पुनः प्राप्तो महापापानुबन्धिनीत् ॥ १८६ ॥ इत्यमात्यस्य दुर्वृतं राजाऽऽत्मनि विचिन्तयन् । धर्मिलाख्याय विप्राय तत्साचिव्यपदं ददौ ॥ १८७ ॥ काले गच्छति सत्येवमन्येद्युरसनाटवी । पर्यन्तविमलायुक्तिकान्तारक्ष्माभृति स्थितम् ॥ १८८ ॥ वरधर्मयतिं प्राप्य भद्रमित्रवणिग्वरः । श्रुत्वा धर्मं धनं दाने त्यजन्तमतिमात्रया ॥ १८९ ॥ तस्य माता सुमित्राख्यासहमानातिकोपिनी । काले मृत्वासनाटव्यां 'शार्दूलीभूयमागता ॥ १९० ॥ यदृच्छया वनं यातमवलोक्य दुराशया । साऽखादत्स्वसुतं कोपाचित्रं किं अनाश्यमङ्गिनाम् ॥ १९१ ॥ स स्नेहाद्रामदत्तायाः सिंहचन्द्रः सुतोऽभवत् । पूर्णचन्द्रोऽनुजस्तस्य भूपतेस्तावतिप्रियौ ॥ १९२॥ भाण्डागारावलोकार्थं कदाचिन्नृपतिं गतम् । दशति स्म निजक्रोधाच्चक्षुः श्रुतिरगन्धनः ॥ १९३ ॥ तदा गरुडदण्डेन सर्पानाहूय मन्त्रतः । निर्दोषोऽमुं प्रविश्या मे निर्गतः शुद्धिमाप्नुयात् ॥ १९४ ॥ अन्यथा निग्रहीष्यामीत्युक्ता विषधराः परे । जलाशयादिवाक्केशान्निर्यान्ति स्म हुताशनात् ॥ १९५ ॥ है और घरमें धनका अभाव होता है तब दूसरी तरहकी चोरी करनी पड़ती है वह भी लोभ कषाय अथवा किसी अन्य दुष्कर्म के उदयसे होती है ।। १८१ ।। यह जीव दोनों प्रकारकी चोरियोंसे अशुभ आयुका बन्ध करता है और अपनी दुष्ट चेष्टासे दुर्गतिमें चिरकाल तक भारी दुःख सहन करता है ।। १८२ ॥ चोरी करनेवालेकी सज्जनता नष्ट हो जाती है, धनादिके विषयमें उसका विश्वास चला जाता है, और मित्र तथा भाई-बन्धुओंके साथ उसे प्राणान्त विपत्ति उठानी पड़ती है ॥ १८३ ॥ जिस प्रकार दावानलसे छुई हुई लता शीघ्र ही नष्ट हो जाती है उसी प्रकार गुणरूपी फूलोंसे गुंथी हुई कीर्तिरूपी ताजी माला चोरीसे शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥ १८४ ॥ यह सब जानते हुए भी मूर्ख सत्यघोष (श्रीभूति ) ने पहली नैसर्गिक चोरीके द्वारा यह साहस कर डाला ।। १८५ ।। इस चो कारण ही वह मंत्री पदसे शीघ्र ही भ्रष्ट कर दिया गया, उसे पूर्वोक्त कठिन तीन दण्ड भोगने पड़े तथा बड़े भारी पापसे बँधी हुई दुर्गतिमें जाना पड़ा ।। १८६ ।। इस प्रकार अपने हृदयमें मंत्रीके दुराचारका चिन्तन करते हुए राजा सिंहसेनने उसका मंत्रीपद धर्मिल नामक ब्राह्मणके लिए दे दिया ।। १८७ ॥ १११ इस प्रकार समय व्यतीत होने पर किसी दिन असना नामके वनमें विमलकान्तार नामके पर्वत पर विराजमान वरधर्म नामके मुनिराजके पास जाकर सेठ भद्रमित्रने धर्मका स्वरूप सुना और अपना बहुत-सा धन दानमें दे दिया। उसकी माता सुमित्रा इसके इतने दानको न सह सकी अतः अत्यन्त क्रुद्ध हुई और अन्त में मरकर उसी असना नामके वनमें व्याघ्री हुई ।। १८८ - १६०।। एक दिन भद्रमित्र अपनी इच्छासे असना वनमें गया था उसे देखकर दुष्ट अभिप्राय वाली व्याघ्रीने उस अपने ही पुत्रको खा लिया सो ठीक ही है क्योंकि क्रोधसे जीवोंका क्या भक्ष्य नहीं हो जाता ? ।। १६१ ।। वह भद्रमित्र मरकर स्नेहके कारण रानी रामदत्ताके सिंहचन्द्र नामका पुत्र हुआ तथा पूर्णचन्द्र उसका छोटा भाई हुआ । ये दोनों ही पुत्र राजाको अत्यन्त प्रिय थे || १६२ || किसी समय राजा सिंहसेन अपना भाण्डागार देखनेके लिए गये थे वहाँ सत्यघोषके जीव अगन्धन नामक सर्पने उसे स्वकीय क्रोधसे डस लिया ॥ १६३ ॥ उस गरुड़दण्ड नामक गारुडीने मन्त्रसे सब सर्पको बुलाकर कहा कि तुम लोगोंमें जो निर्दोष हो हममें प्रवेश कर बाहर निकले और शुद्धता प्राप्त करे ।। १६४ ।। अन्यथा प्रवृत्ति करने पर मैं दण्डित करूँगा । इस प्रकार कहने पर अगन्धनको छोड़ बाकी सब सर्प उस अग्निसे क्लेशके बिना ही इस तरह बाहर निकल आये जिस तरह कि मानो किसी जलाशय से ही बाहर निकल १ सा व्यालीभूय-ल० । २ चिरं ख०, ब० । ३ श्राश्यं खाद्यम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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