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________________ एकोनषष्टितमं पर्व विमलेऽब्दसमे बोधे दृश्यते विमलं जगत् । विमलं यस्य मे सोऽध विमलं विमलः क्रियात् ॥१॥ प्रतीचि धातकीखण्डे देवाद्यपरभागभाक । नदीदक्षिणकूलस्थो विषयो रम्यकावती ॥२॥ पनसेनो महीशोऽत्र महानगरमास्थितः । प्रजाभ्य इव कल्पागः समीप्सितफलप्रदः ॥ ३॥ तन्त्रावापविभागोक्तनीतिशास्त्रार्थनिश्चये। उदाहरणमित्याहुस्तद्वृत्तं शास्त्रवेदिनः ॥ ४ ॥ अर्जनानुभवावर्थे प्रजानामात्मवृत्तिभिः । व्यापारो रक्षके तस्मिन् महीशे मदिंतद्विषि ॥५॥ नाक्रामति प्रजा न्याय तां नाक्रमति भूपतिः। तं त्रिवर्ग त्रिवर्गस्य नान्योन्यातिक्रमः कचित् ॥ ६॥ प्रीतिकरवने ४सर्वगुप्तकेवलसन्निधौ । धर्मतत्त्वं परिज्ञाय स्वैष्यजन्मद्वयं च सः ॥ ७ ॥ तदैव तीर्थकृज्जात इव जातमहोत्सवः । पद्मनाभाय दत्वैश्य 'प्रारब्ध परमं तपः ॥८॥ प्रतीतैकादशानार्थो भावनाहिततीर्थकृत् । शेषपुण्यसमग्रोऽयमाराध्यान्ते चतुष्टयम् ॥ ९॥ सहस्रारविमानेशस्तमामेन्द्रोऽजनिष्ट सः । अष्टादशाब्धिमानायुरेकचापतनूच्छूितिः ॥ १० ॥ जघन्यशुक्लद्वयभाग नवमासेषु निःश्वसन् । अष्टादशसहस्राब्दैराहारं मनसाऽऽहरन् ॥११॥ तृप्तो रूपप्रवीचारात् प्राकचतुर्थधरावधिः । तावन्मानप्रकाशादिरणिमादिगुणोतः ॥१२॥ स स्नेहामृतसम्पृक्तमुखाम्बुरुहदर्शनात् । सन्तपिंतामरीचेताः सुचिरं सुखमन्वभूत् ॥ १३॥ जिनके दर्पणके समान निर्मल ज्ञानमें सारा संसार निर्मल-स्पष्ट दिखाई देता है और जिनके सब प्रकारके मलोंका अभाव हो चुका है ऐसे श्री विमलनाथ स्वामी आज हमारे मलोंका अभाव करें-हम सबको निर्मल बनावें ॥ १॥ पश्चिम धातकीखण्ड द्वीपमें मेरुपर्वतसे पश्चिमकी ओर सीता नदीके दक्षिण तट पर रम्यकावती नामका एक देश है ॥२॥ उसके महानगरमें वह पद्मसेन राजा राज्य करता था जो कि प्रजाके लिए कल्पवृक्षके समान इच्छित फल देनेवाला था ॥३॥ स्वदेश तथा परदेशके विभागसे कहे हुए नीति-शास्त्र सम्बन्धी अर्थका निश्चय करने में उस राजाका चरित्र उदाहरण रूप था ऐसा शास्त्रके जानकार कहा करते थे॥४॥ शत्रुओंको नष्ट करनेवाले उस राजाके राज्य करते समय अपनी-अपनी वृत्तिके अनुसार धनका अजेन तथा उपभोग करना ही प्रजाका व्यापार रह गया था ॥५॥ वहाँकी प्रजा कभी न्यायका उल्लंघन नहीं करती थी, राजा प्रजाका उल्लंघन नहीं करता थ र्थ, काम रूप त्रिवर्ग राजाका उल्लंघन नहीं करता था और त्रिवर्ग परस्पर एक दूसरेका उल्लंघन नहीं करता था ॥६॥ किसी एक दिन राजा पद्मसेनने प्रीतिकर वनमें स्वर्गगुप्त केवलीके समीप धर्मका स्वरूप जाना और उन्हींसे यह भी जाना कि हमारे सिर्फ दो आगामी भव बाकी रह गये हैं।॥ ७॥ उसी समय उसने ऐसा उत्सव मनाया मानो मैं तीर्थंकर ही हो गया हूँ और पद्मनाभ पुत्रके लिए राज्य देकर उत्कृष्ट तप तपना शुरू कर दिया ।। ८॥ ग्यारह अंगोंका अध्ययन कर उनपर दृढ़ प्रत्यय किया, दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध किया, अन्य पुण्य प्रकृतियोंका भी यथायोग्य संचय किया और अन्त समयमें चार आराधनाओंकी आराधना कर सहस्रार नामक स्वर्गमें सहस्रार नामका इन्द्रपद प्राप्त किया। वहाँ अठारह सागर उसकी आयु थी, एक धनुष अर्थात् चार हाथ ऊँचा शरीर था. द्रव्य और भावकी अपेक्षा जघन्य शुक्ललेश्या थी, वह नौ माह में एक बार श्वास लेता था, अठारह हजार वर्ष में एक बार मानसिक आहार ग्रहण करता था, देवांगनाओंका रूप देखकर ही उसकी काम-व्यथा शान्त हो जाती थी, चतुर्थ पृथिवी तक उसके अवधिज्ञानका विषय था, वहीं तक उसकी दीप्ति आदि फैल सकती थी, वह अणिमा महिमा आदि गुणोंसे समुन्नत १ मलस्याभावो विमलम् अव्ययीभावसमासः। २ विभोगोक्त क०, ५०। । शास्त्रसमुच्चये ल । ४ सर्वतप्त ल०। ५ प्रारब्धं ख०, ल०। १३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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